सिंगल-स्क्रीन का संस्कार: छोटे शहरों की सामूहिक सिनेमाई स्मृति
सिनेमाई संस्कार: सिंगल-स्क्रीन थिएटर की स्मृति संस्कार मिलने के लिए दो “माया” होती थीं—एक माँ और दूसरा सिनेमा। माँ जीवन की पहली भाषा सिखाती थी, और सिनेमा दुनिया को देखने का तरीका। माँ से अच्छाई-बुराई की समझ मिलती थी, सिनेमा से भावनाओं की भाषा। माँ घर के भीतर का संसार खोलती थी, सिनेमा घर के बाहर का। छोटे कस्बों में तो सिनेमा कई बार किताब, अखबार, मेला और लोककथा—सबका सम्मिलित रूप लगता था। देवकी पैलेस, काकादेव, कानपुर उस समय सिंगल-स्क्रीन थिएटर केवल फिल्म दिखाने की जगह नहीं था। वह छोटे शहरों की सामूहिक स्मृति था। वहाँ दर्शक केवल दर्शक नहीं होते थे—वे फिल्म के साथ जीते थे, ताली बजाते थे, सीटियाँ मारते थे, असहज होते थे, हँसते थे, डरते थे, और कई बार फर्स्ट क्लास टिकट के लिए लड़ भी पड़ते थे| थिएटर एक इमारत भर नहीं था; वह शहर की धड़कन था। अंधेरे हॉल में 300 लोगों की एक धड़कन पुराने सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों का अनुभव अजीब तरह से निजी भी था और सामूहिक भी। अंधेरे हॉल में 300 लोग एक साथ फिल्म देखते थे, लेकिन हर आदमी उसे अपने-अपने तरीके से जीता था। कोई अपने प्रेम की कहानी ढूँढता था, कोई ही...