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रामलीला: एक कथा, अनेक रंग

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प्रसिद्ध अर्जेंटीनी साहित्यकार होर्खे लुई बोर्खेस का मानना था कि मानव सभ्यता मूलतः चार कथाएँ बार-बार सुनाती आई है: नगर की घेराबंदी, घर वापसी, किसी लक्ष्य की खोज और त्याग या बलिदान। रामायण में ये चारों शाश्वत कथाएँ एक साथ मिलती हैं। लंका की घेराबंदी, चौदह वर्षों बाद अयोध्या वापसी, सीता की खोज और पिता के वचन के लिए राम का राजसिंहासन त्यागना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। शायद इसी कारण रामकथा कभी पुरानी नहीं पड़ती। कथा का आरंभ, संघर्ष और अंत सबको पहले से मालूम होता है, फिर भी रामलीला शुरू होते ही दर्शकों के भीतर वही भक्ति-भाव, वही उत्सुकता और वही भाव-विभोरता जाग उठती है। रामलीला ने इस परिचित कथा को ग्रंथों से निकालकर जनजीवन के बीच प्रत्यक्ष कर दिया। मैदान अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट और लंका बन जाते; गाँव और मुहल्ले के लोग राम, लक्ष्मण, हनुमान और रावण का रूप धारण करते; कारीगर बाँस, कपड़े और रंगीन कागज से महल, मुकुट और विशाल पुतले रचते। दर्शक जानते थे कि आगे क्या होने वाला है, फिर भी वनवास पर आँखें नम होतीं, भरत-मिलाप पर हृदय भर आता और रावण-दहन की प्रतीक्षा में वही बालसुलभ रोमांच लौट आता। इसलिए बीत...

90 के दशक की बाल और किशोर पत्रिकाएँ

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रेलवे स्टेशनों पर ए एच व्हीलर की दुकानों ने कई पीढ़ियों को पाठक बनाया और किताबों को लोकप्रिय बनाया। दुकान के बाहर सजी बाल पत्रिकाओं के बीच में 'चंपक' दिख गई जो अब ए फोर साइज में छपती है। हमारे समय में यह किताब के आकार में छपती थी। इसके साथ याद आ गई पराग, नंदन, चंदामामा, लोटपोट, ट्विंकल और ढेर सारी कामिक्स सीरीज। इन पत्रिकाओं के साथ बीता बचपन यानी जीवन का स्वर्णिम युग। दिवाली—पर जब हम ट्रेन से यात्रा करते थे, पिता जी अक्सर हमें रास्ते में पढ़ने के लिए किताबें लाकर देते थे। वे आम तौर पर "चंपक" और "नंदन" जैसी किताबें खरीदना पसंद करते थे, क्योंकि उनमें कई छोटी-छोटी कहानियाँ होती थीं और एक के बाद एक पढ़ते-पढ़ते समय जल्दी कट जाता था। छोटी बहन चंपक की कहानियों से बहुत खुश रहती थी, जबकि मैं कॉमिक्स का दीवाना था और बार-बार उसी रोमांच का इंतज़ार करता था। एक बार मैंने हिंदी में He-Man की कॉमिक्स खरीद ली—ट्रेन की पूरी यात्रा में वह किताब मेरे साथ रही और मैं उसे बार-बार पढ़ता रहा। जब हमें बैठने की जगह मिली तो भी मेरी रुचि कम नहीं हुई; मैं लगातार कॉमिक्स में खोया रहा और व...

90 का दशक: हिंदी अख़बार, घर और छोटे शहरों की नागरिक स्मृति

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1950 से 1990 का दौर भारत में बहुत मायनों में परिवर्तन का काल था। संविधान लागू हो चुका था और समानता, अधिकार, सामाजिक न्याय और आधुनिक नागरिकता की भाषा धीरे-धीरे जनता के बीच पहुँच रही थी। लेकिन यह भाषा सिर्फ़ संसद, अदालत या विश्वविद्यालयों से नहीं आई। छोटे शहरों और कस्बों में यह भाषा अख़बारों के जरिए घरों तक पहुँची। दैनिक जागरण, स्वतंत्र भारत, आज और बाद में राष्ट्रीय सहारा जैसे अख़बारों ने हिंदी पट्टी के पाठकों को सिर्फ़ खबर नहीं दी, बल्कि यह भी सिखाया कि नागरिक होना क्या होता है। सच कहें तो 90 के दशक में अखबार समाचार से कहीं ज्यादा था। वह घर, शहर, बाजार, करियर, मनोरंजन, धर्म, त्योहार, उम्मीदों और बदलते समय का दस्तावेज था। वह रोज सुबह दरवाजे पर नहीं आता था, बल्कि अपने साथ पूरा समाज लेकर आता था। सुबह का अख़बार: घर में दुनिया के आने की आवाज़ सुबह-सुबह दरवाजे पर अखबार गिरने की आवाज अपने-आप में एक अलार्म जैसी होती थी। अखबार वाला साइकिल से आता, मुड़ा हुआ अखबार फेंकता, और वह कभी दरवाजे के पास, कभी बरामदे में, कभी गमले के पास जाकर गिरता। अखबार अभी पूरा ताजा होता था, कागज की ठंडी तहें और ऊपर लगा ...

जब टीवी हमारी दुनिया की खिड़की था

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सच कहूँ तो इक दौर में दूरदर्शन सिर्फ़ एक चैनल नहीं था, वह हमारी दुनिया की खिड़की था। वही खबरें थीं, वही कहानियाँ थीं, वही हँसी थी और वही इंतज़ार था। वास्तविकता और कल्पना की सीमाएँ साफ़ थीं; जो दिखता था, वह सबका साझा अनुभव बन जाता था। एक ही कार्यक्रम पर चर्चा घर-गली में एक जैसी चल पड़ती थी और बातचीत का रंग भी उससे जुड़ जाता था। विज्ञापन भी यादगार होते थे—छोटी-छोटी चीज़ें सामूहिक यादों में बस जाती थीं।  दूरदर्शन टीवी धारावाहिक नब्बे के दशक के बच्चों के सहनशील होने की बड़ी वजह यही थी कि वे दूरदर्शन पर अपने पसंदीदा धारावाहिक देखने के लिए आने वाली उबाऊ खबरों—हिंदी, अंग्रेज़ी, यहाँ तक कि रविवार विशेष मूक-बधिर समाचार और संस्कृत समाचार—को भी हँसते हुए झेल लेते थे। दोपहर का दूरदर्शन अपने आप में एक पूरी नियमित कार्यक्रम-सारिणी था—जैसे जीवन का सरकारी कैलेंडर। बारह बजे ‘ औरत’ , साढ़े बारह बजे ‘ अपराजिता ’, एक बजे ‘ वक़्त की रफ़्तार ’, डेढ़ बजे ‘ इतिहास ’, दो बजे   अंग्रेज़ी और  हिंदी  समाचार, ढाई बजे ‘ शांति: एक घर की कहानी ’, तीन बजे ‘ युग ’ और साढ़े तीन बजे ‘ स्वाभिमान ’। उन्न...