2nd Letter to Teen Taal (तीन ताल को द्वितीय ख़त)

तीन ताल के सभी साथियों को जय हो, जय हो, जय हो!  कमलेश ताऊ, कुलदीप सरदार और आसिफ़ खान चा को मेरा नमन!  "जस मतंग तस पादन घोड़ी, बिधना भली मिलाई जोड़ी" — ये लोक कहावत का आशय है कि जैसे हाथी को उसके पांव के अनुसार घोड़ी मिलनी चाहिए, उसी तरह विधाता समान लोगों की जोड़ी बना देता है। मेरे जैसे काम में उलझे हुए लोगों का तीन ताल का दर्शक बनना सुंदर संयोग है !  

मेरे में लखनऊ की किस्सागोई नहीं है ना ही है हरियाणा का ठेठ अंदाज़ ! पर १०० -२००  घण्टे सुनते सुनते लिखने का मन हो ही गया। परसाई जी की बात याद आयी : जो प्रेमपत्र में मूर्खतापूर्ण बातें न लिखे, उसका प्रेम कच्चा है, उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए पत्र जितना मूर्खतापूर्ण हो, उतना ही गहरा प्रेम समझना चाहिए।  अतः बहुत प्रेम से  तीन ताल को लिखा प्रथम ख़त लिखा जो प्रोग्राम में पढ़ा नहीं गया, ना जाने किस गलियारों में खो गया। मन में बहुत तीस उठी। कई लेखक मानते हैं कि संपादकीय अस्वीकृति व्यक्तिगत पसंद या बाजार की मांग के कारण होती है, पर मुझ नौसिखिए को पता है कि यह अस्वीकृत चिठ्ठी में बकैती की कमी है।  

हिंदी साहित्य में कवियों और संतों ने अस्वीकृति को केवल अंत नहीं, बल्कि आत्म-विकास का द्वार माना है। अस्वीकृति मनुष्य के सबसे गहरे  और कभी कभी  कटु अनुभवों में से एक  होती  है। फिर भी, यही अस्वीकृति हमें आत्मबल और धैर्य का सबसे गहरा पाठ पढ़ाती है। जैसे तीन ताल में अपेक्षित चिट्ठी  नहीं  पढ़ी  जाती है  तो यह अस्वीकृति  एक  मन में  अधूरापन  छोड़ देती  है। लेकिन इसी अधूरेपन में एक नई चिठ्ठी  का बीज छिपा होता है।

"मेरे पास दो रास्ते थे – ‘हारे को हरिनाम’ और ‘नीड़ का निर्माण फिर से’! सो उम्मीद का रास्ता चुनकर द्वितीय ख़त लिख रहा हूँ। यह द्वितीय कह रहा हूँ दूसरा नहीं क्यूंकि पहला प्रेम हो या पहला पत्र अद्वितीय होता है ! खान चा की गवाही चाहूंगा ! 

खैर  क़िस्सागोई मुझसे आती नहीं और  बातों को सँवारने का हुनर नहीं है मेरे पास, बस जैसे मन में आता है वैसे ही उगल देता हूँ।  पिछली चिट्ठी धीरे-धीरे आंच पर पकाए हुए मटन जैसा थी, लेकिन यह लेख तो फास्ट फूड है, जो एक समझदार मगर थोड़ा तड़कते हुए अहंकार के कारण जल्दी-जल्दी तैयार हो गया है। इस लेख में थोड़ा घमंड भी मिला है, जिससे बातों की गहराई कुछ कम रह गई है। 

मुझे तीन ताल क्यों पसंद है? तीन ताल  मेरे लिए एक थियेटर ऑफ़ द एब्सर्ड है ! यह एक ऐसा संवाद है, जो अक्सर  साधारण बातों को भी असामान्य बना देता है।  लगता है जैसे हम लोग मित्रों से चाय की दुकान या नाई की दूकान जैसे  गैर-औपचारिक माहौल में बैठे हंसी ठिठोली कर रहे हैं। 

लिखने की तो नहीं, मेरी पढ़ने की बहुत आदत थी । मेरी शरारतों के बावजूद घरवालों की कोशिशों का ही नतीजा था कि तक़रीबन सात साल से रविवार अख़बार का बच्चों का पन्ना, चंपक, सुमन सौरभ, नंदन, बालहंस, नन्हे सम्राट और कामिक्स पढ़ने की आदत हो गयी थी । बचपन में  दादी और बाबा से अनगिनत कहानी सुनी ! उन दिनों को याद करते हुए कई बार मैं अपने से पूछता हूँ - हिंदी के प्रति प्यार के पीछे सबसे बड़ा प्रेरक तत्त्व क्या था ? मुझे एक ही जवाब मिलता है - वे मेरे बचपन के दिन थे और मेरे बेशुमार कहानी सुनने के सपने थे।उसी समय में हिंदी से मन, वचन और कर्म से भावनात्मक लगाव हो गया

अब हिंदी का प्रोफेशनल उपयोग जीवन में नहीं है। यक़ीन करें, मैंने हिंदी में कहानी सुनना और सपने देखना अब भी नहीं छोड़ा है!  ऑनलाइन के ज़माने में भी कोशिश करके साल १-३ किताब हिंदी में जरूर पढता हूँ।  आज जब मैं "तीन ताल" के पॉडकास्ट में ताऊ, चा और सरदार की बातें सुनता हूँ, तो मेरे मन में बचपन की मीठी यादें, हिंदी भाषा की मोहब्बत और घर के बुजुर्गों की छवि एक साथ जीवंत हो उठती है |  हाल ही में बीते हुए हिंदी दिवस  पर सभी हिंदीभाषी और हिंदी प्रेमियों को हार्दिक शुभकामनाएं। 

बाकी तो राजनैतिक दलाली और घटिया दलीलों से भरे न्यूज़ के दौर में बकवास सुनना एक ब्रह्मज्ञान प्रतीत होता है। अब लगता है'क्या बकवास है' या तो निहिलिज़्म की तरफ पलायन करते हुए लोगों का जाप है या फिर जेन ज़ी में क्रांति के बीज बोते हुए ताऊ का महामंत्र ! जय हो, जय हो, जय हो! 

--- यायावर  ( टीटी स्टाफ)

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