मसान

24 जुलाई 2015 के दिन रिलीज़ हुई एक बहुत ख़ास फ़िल्म। आज दस साल पूरे हो गए मसान के। ये बहुत प्यारी फ़िल्म है। और बहुत ज़रूरी फ़िल्म भी है। नीरज घायवान ने इस फ़िल्म को डायरेक्ट किया था। और वरुण ग्रोवर ने कहानी और गीत लिखे थे। मसान का संगीत इंडियन ओशन बैंड द्वारा रचित है, जो अपनी फ्यूजन शैली के लिए जाना जाता है। सबसे पहले, वरुण जी और नीरज जी ग़ज़ब गुरु! कोटि कोटि प्रणाम!

मसान शब्द का शाब्दिक अर्थ है "श्मशान"। यह वह स्थान है जो मृत्यु और अंतिम संस्कार से जुड़ा होता है, और यह जीवन के अनश्वर होने का प्रतीक भी माना जाता है। फिल्म "मसान" बनारस के जीवन और मृत्यु के बीच समाज की दो अलग-अलग कहानियों को बताती है और सामाजिक जटिलताओं को दर्शाती है। पर बनारस ही क्यों? बनारस, जहां मृत्यु केवल शोक नहीं है, यह एक उत्सव है और मसान विश्रामस्थली मानी जाती है। मसान की गोद में एक ज़िंदा थकान। जब ज़िंदगी थका दे, तो मसान ही आरामगाह है। यहीं तो चिता की राख से होली मनाई जाती है, जहाँ अंत में भी एक नया आरंभ झलकता है। इस फिल्म में दो मुख्य कहानियां हैं—एक कहानी देवी की है, और दूसरी कहानी दीपक की है। देवी और दीपक के अंतर्मन का द्वंद्व किसी न किसी की मृत्यु से शुरू होते हैं। फिल्म में जातिवाद, समाज के पुराने ढर्रे, आर्थिक कठिनाइयां, और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर मुद्दों को बहुत आसान और गहराई से दिखाया गया है। यह केवल एक सामाजिक फिल्म नहीं है, इसे महसूस कीजिए—यह एक सच्ची और निश्छल प्रेम कहानी है।

इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य और बातें हैं जो आपको हंसाएंगे, रुलाएंगे और जिंदगी की सच्चाई भी दिखाएंगे। इसलिए मैं कहता हूँ कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक इमोशन है। जब पंकज त्रिपाठी जी ऋचा चड्ढा से कहेंगे: "देवी जी! हम पिताजी के साथ रहते हैं! पिताजी अकेले रहते हैं!" 

जब दीपक को अपने दोस्तों के बीच रोते हुए बोलेंगे: "ई साला दुख कभी खत्म काहे नहीं होता बे।”

फिल्म समझाती है कि ज़िंदगी में हर चीज़ ठीक होना जरूरी नहीं। 'मसान' मोक्ष की बात करती है, लेकिन वह मृत्यु के बाद के मोक्ष की नहीं बल्कि रोज़मर्रा की थकान भरी जिंदगी में मिलने वाले उन क्षणों की है, जो मोक्ष के समान महसूस होते हैं। फिल्म मसान में सौम्य संगीत और संवेदनशील गीत सीधे दिल को छू जाते हैं।
"मन कस्तूरी रे....जग दस्तूरी रे! बात हुई ना.......पूरी रे!"

मेरा पसंदीदा गीत सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि जीवन की गहन सच्चाई है। चाहे आप इसे अकेले सुनें या फिल्म के साथ देखें, इसकी गहराई को आप बेहतर समझ पाएंगे। यह गीत प्रेम और जीवन के दार्शनिक पहलुओं को छूता है, जहां मन की बेचैनी और अधूरी इच्छाएं सामने आती हैं। मुझे गाना सुनकर संत कबीर का वह प्रसिद्ध दोहा याद आता है:
"कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूँढ़े बन माहि। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाँहि॥"

यह गीत मन की बेचैनी, अधूरे सपनों और उस अनिश्चित प्रेम की कहानी कहता है, जो अनगिनत भावनाओं को समेटे हुए है।

आपको लगता ही नहीं कि आप कोई फ़िल्म देख रहे हैं! "मसान" की शुरुआत बनारस से होती है, जहां पात्र अपनी अस्मिताओं, जातिगत जंजालों और सामाजिक बंधनों से जूझते हैं। वहीं फिल्म का अंत संगम पर होता है — जो शुद्धता और मोक्ष का प्रतीक है। यह स्थानों का चयन नायक पात्रों के व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्षों, उनके पुनर्निर्माण और मुक्ति की कहानी को गहराई प्रदान करता है। एक सच्चे सिनेप्रेमी की नजर से ये फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती है। और फिल्म की अंतिम पंक्ति भी सबको ज़रूर याद रह जाएगी

"कहते हैं जिंदगी में संगम दो बार जरूर आना चाहिए! एक बार अकेले.....और एक बार किसी के साथ!"

तो आपने मसान देखी हो तो अपने भी विचार बताइए! नहीं देखी हो तो जरूर देखिएगा और तब बताइएगा!
यह वृत्तचित्र "Children of the Pyre" मानवता, मृत्यु और जीवन के जटिल पहलुओं को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत करता है। इसे देखने वाले हर दर्शक को जीवन के प्रति गहरा सम्मान और सोचने पर मजबूर कर देगा।

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