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कानपुर की बिजली कथा: केसा, कटिया और कुपित पिताजी

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90s के कानपुर की गर्मी का अपना अलग ही साउंडट्रैक था—दूर कहीं जनरेटर की घर्र-घर्र, गलियों में बच्चों की आवाज़ें, छतों पर बिछी चारपाइयाँ, हाथ से झलते पंखे, और अचानक पूरे मोहल्ले में उठती एक सामूहिक घोषणा -  “ बत्ती चली गई!” आज बिजली जाना एक असुविधा लगता है, लेकिन तब वह रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। जैसे शाम होगी, खाना बनेगा, मच्छर आएँगे—वैसे ही कभी न कभी बत्ती भी जाएगी। और बत्ती जाते ही घर का पूरा भूगोल बदल जाता था। पंखा रुकता, कूलर लोहे का डिब्बा बन जाता, ऑल आउट बेअसर हो जाता और फिर कछुआ छाप कॉइल या मच्छरदानी की बारी आती। 90s में बत्ती जाती थी तो मनोरंजन का आखिरी सहारा अक्सर रेडियो होता था । कभी विविध भारती, कभी क्रिकेट कमेंट्री, कभी समाचार, और कभी पुराने गाने| अगर रात में सुसू लग जाए, तो अँधेरे में टॉर्च ढूँढना, भूतों के डर से हनुमान चालीसा याद करते हुए बाथरूम तक जाना और वापस आना अपने आप में एक छोटी-सी एडवेंचर फिल्म जैसा लगता था। कानपुर की बारिश का अपना अलग ही स्वैग था। बादल घिरते ही हवा में मिट्टी की खुशबू फैल जाती, गली के लौंडे चिल्लाने लगते —“ अबे पानी बरसिहै !” लेकिन 90 के ...