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Single Screen Theatre: सलेमपुर, कानपुर और 90s के सिनेमा की यादें

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अभिनेता याद रखे जाते हैं जनमानस में, निर्देशक को इतिहास याद रखता है। लेकिन छोटे कस्बों में सिनेमा केवल अभिनेता या निर्देशक का नाम नहीं होता था—वह पूरा माहौल होता था। पोस्टर, रिक्शे पर अनाउंसमेंट, टिकट की लाइन, फर्स्ट क्लास और बालकनी का फर्क, इंटरवल की बेचैनी, और फिल्म शुरू होने से पहले चलने वाले विज्ञापन - सब मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाते थे, जिसे आज भी याद करते ही मन उसी समय में लौट जाता है।   ये  वो दौर था जब मोहब्बत मोबाइल पर नहीं,  मोहल्ले के नुक्कड़ पर आँखों से शुरू होती थी ।  जब लड़के खुद को ‘बाज़ीगर’ समझते थे,  और हर लड़की में उन्हें अपनी ‘सिमरन’ दिखाई देती थी |  ये वो ज़माना था जब हीरो बनने के लिए बदन नहीं,  बस दिल में दर्द, बालों में माँग और आँखों में इकरार चाहिए होता था…  और हर आशिक़ के दिल में बस एक ही आवाज़ गूँजती थी —  इलू  इलू !  मुझे मेरे स्कूली दिनों वाला सलेमपुर कस्बा, देवरिया याद आ गया—और वहाँ का ‘ मेनका टॉकीज़ ’ भी। मेरा स्कूल, लिटिल फ्लावर स्कूल , मेनका थिएटर से शायद 200-300 मीटर ही दूर रहा होगा। उस छोटी-सी द...