नब्बे के दशक का रेडियो, क्रिकेट और बचपन
नब्बे का दशक सिर्फ एक समय नहीं था—वो एक आवाज़ था। कभी बड़े रेडियो सेट की भारी-भरकम गूंज में, कभी छोटे ट्रांजिस्टर की खड़खड़ाती धुन में, और कभी दूर कहीं से आती कमेंट्री में - “आशीष विंस्टन जैदी गेंदबाज़ी के लिए तैयार…” आज जब सब कुछ स्क्रीन पर है, तब भी वह दौर याद आता है जब मैच “देखे” नहीं जाते थे, सुने जाते थे। कल्पना ही हमारा स्टेडियम थी, कमेंटेटर की आवाज़ ही हमारी आंखें थीं, और रेडियो- हमारा सबसे भरोसेमंद साथी। सलेमपुर से कानपुर: एक बच्चे की रेडियो वाली दुनिया जून 1994 में जब मैं सलेमपुर से कानपुर आया, मेरी उम्र सिर्फ 9 साल थी। नया शहर था, नई गलियां थीं, नए चेहरे थे—लेकिन एक चीज़ पुरानी थी: रेडियो की आवाज़। घर में रेडियो बजता था तो लगता था जैसे बाहर की दुनिया कमरे में उतर आई हो। विविध भारती का नाम सुनते ही मन में एक अपनापन जागता था। खासकर विविध भारती का कानपुर केंद्र—उसकी अपनी स्थानीय महक थी, अपनी बोली, अपना ठहराव। रेडियो पर कार्यक्रमों का प्रसारण उस समय केवल मनोरंजन नहीं था; वह जीवन का हिस्सा था। आज की तरह हर चीज़ ऑन-डिमांड नहीं थी। पसंदीदा कार्यक्रम का इंतज़ार करना पड़ता था। और ...