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80s–90s : जब अनुशासन का दूसरा नाम था चप्पल, बेल्ट और मुरगा

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चेतावनी / सूचना:  यह कथा सत्य घटनाओं पर आधारित है। इसे गल्प मानना हमारे बचपन के अनुभवों का अपमान होगा। 80s–90s के भारतीय बचपन की एक सामूहिक स्मृति इतिहास कहता है कि पीछे मत देखो, लेकिन यादें कहाँ किसी की बंदिश सुनती हैं। वे अपनी मर्ज़ी से लौट आती हैं—कभी किसी पुरानी कॉपी की बुरी लिखावट में, कभी स्कूल के स्टील वाले स्केल की चमक में, कभी घर के दरवाज़े के पास पड़ी चप्पल में, और कभी पिताजी की उस नज़र में, जिसे देखकर आत्मा कांप जाती थी। हम उस पीढ़ी से आते हैं जहाँ बचपन केवल खेल, कॉमिक्स , VCR और गर्मियों की छुट्टियों का नाम नहीं था। वह अनुशासन, डर, शर्मिंदगी, बचाव-प्रयास और माँ की अंतिम अपील का भी नाम था। आज यह सब लिखते हुए हँसी आती है, लेकिन उस समय हँसी नहीं आती थी।  और सच कहूँ तो यह केवल मेरी कहानी नहीं है। 80s–90s के भारतीय बच्चों ने स्कूलों की मार, स्केल, बेंत, सार्वजनिक शर्मिंदगी और घर के डर को अपने बचपन का हिस्सा बताया है |उस दौर में काउंसलिंग नहीं थी, पॉजिटिव पेरेंटिंग नहीं थी, और "चाइल्ड साइकोलॉजी" तो शायद शब्दकोशों में ही मिलती थी। अनुशासन के अपने तरीके थे—घर के और स...