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जब टीवी हमारी दुनिया की खिड़की था

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सच कहूँ तो इक दौर में दूरदर्शन सिर्फ़ एक चैनल नहीं था, वह हमारी दुनिया की खिड़की था। वही खबरें थीं, वही कहानियाँ थीं, वही हँसी थी और वही इंतज़ार था। वास्तविकता और कल्पना की सीमाएँ साफ़ थीं; जो दिखता था, वह सबका साझा अनुभव बन जाता था। एक ही कार्यक्रम पर चर्चा घर-गली में एक जैसी चल पड़ती थी और बातचीत का रंग भी उससे जुड़ जाता था। विज्ञापन भी यादगार होते थे—छोटी-छोटी चीज़ें सामूहिक यादों में बस जाती थीं।  दूरदर्शन टीवी धारावाहिक नब्बे के दशक के बच्चों के सहनशील होने की बड़ी वजह यही थी कि वे दूरदर्शन पर अपने पसंदीदा धारावाहिक देखने के लिए आने वाली उबाऊ खबरों—हिंदी, अंग्रेज़ी, यहाँ तक कि रविवार विशेष मूक-बधिर समाचार और संस्कृत समाचार—को भी हँसते हुए झेल लेते थे। दोपहर का दूरदर्शन अपने आप में एक पूरी नियमित कार्यक्रम-सारिणी था—जैसे जीवन का सरकारी कैलेंडर। बारह बजे ‘ औरत’ , साढ़े बारह बजे ‘ अपराजिता ’, एक बजे ‘ वक़्त की रफ़्तार ’, डेढ़ बजे ‘ इतिहास ’, दो बजे   अंग्रेज़ी और  हिंदी  समाचार, ढाई बजे ‘ शांति: एक घर की कहानी ’, तीन बजे ‘ युग ’ और साढ़े तीन बजे ‘ स्वाभिमान ’। उन्न...

90s नॉस्टैल्जिया: एंटीना, केबल और एक पूरा बचपन

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90 के दशक की केबल-टीवी वाली ज़िंदगी आज सोचें तो किसी अलग ही दुनिया जैसी लगती है। एक ही टीवी पर रूसी कार्टून, चीनी धारावाहिक, दूरदर्शन के कार्यक्रम और बीच-बीच में 8-बिट वीडियो गेम की आवाज़ — सब कुछ बिना इंटरनेट के। न वाई-फाई था, न स्मार्टफोन, फिर भी दुनिया हमारे घर तक पहुँच जाती थी… बस एक टेढ़े-मेढ़े टीवी एंटीना के सहारे। बचपन से ही दूरदर्शन पर हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड का सीधा प्रसारण देखता आ रहा हूं।  भाई, आज न जाने कैसे एंटीना सही करने का पुराना जादू याद आ गया? 90 के दशक में टीवी देखने का मज़ा ही कुछ और था| पहले तो हम DD National और DD Metro के भक्त हुआ करते थे।  रामायण दोबारा देखने में भी गर्व होता था।  एंटीना को घुमाकर और केबल का सिग्नल ठीक करने की कोशिश अपने आप में एक  गेम जैसी होती थी।  और उसी भरोसे में हमारा बचपन दुनिया घूम आता था — बस केबल के सहारे। दूरदर्शन के बाद प्राइवेट चैनलों के आने का इंतज़ार ही सबसे बड़ी एक्साइटमेंट हुआ करता था।  वो दौर जब “केबल कनेक्शन” लगना किसी स्टेटस सिंबल से कम नहीं था। मोहल्ले की किसी छत पर जैसे ही नया केबल ...