Single Screen Theatre: सलेमपुर, कानपुर और 90s के सिनेमा की यादें

अभिनेता याद रखे जाते हैं जनमानस में, निर्देशक को इतिहास याद रखता है।

लेकिन छोटे कस्बों में सिनेमा केवल अभिनेता या निर्देशक का नाम नहीं होता था—वह पूरा माहौल होता था। पोस्टर, रिक्शे पर अनाउंसमेंट, टिकट की लाइन, फर्स्ट क्लास और बालकनी का फर्क, इंटरवल की बेचैनी, और फिल्म शुरू होने से पहले चलने वाले विज्ञापन - सब मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाते थे, जिसे आज भी याद करते ही मन उसी समय में लौट जाता है। ये वो दौर था जब मोहब्बत मोबाइल पर नहीं, मोहल्ले के नुक्कड़ पर आँखों से शुरू होती थी । जब लड़के खुद को ‘बाज़ीगर’ समझते थे, और हर लड़की में उन्हें अपनी ‘सिमरन’ दिखाई देती थी | ये वो ज़माना था जब हीरो बनने के लिए बदन नहीं, बस दिल में दर्द, बालों में माँग और आँखों में इकरार चाहिए होता था… और हर आशिक़ के दिल में बस एक ही आवाज़ गूँजती थी — इलू इलू !

मुझे मेरे स्कूली दिनों वाला सलेमपुर कस्बा, देवरिया याद आ गया—और वहाँ का मेनका टॉकीज़ भी। मेरा स्कूल, लिटिल फ्लावर स्कूल, मेनका थिएटर से शायद 200-300 मीटर ही दूर रहा होगा। उस छोटी-सी दूरी में ही बचपन, सिनेमा और कस्बाई जीवन की पूरी कहानी समाई हुई थी।

Menaka Picture Palace, Salempur

मेनका टॉकीज़: फर्स्ट क्लास, बालकनी और बचपन

मेनका थिएटर केवल एक सिनेमा हॉल नहीं था। वह सलेमपुर की सामाजिक स्मृति का हिस्सा था। सलेमपुर में एक ही सिनेमा हॉल था—मेनका थिएटर—और उसे खोलने वाले लोग तेलुगु थे, जो आंध्र से आकर बसे थे। यह बात भी उस दौर के लिए अपने आप में दिलचस्प थी कि एक छोटे कस्बे की सिनेमाई संस्कृति के पीछे दूर दक्षिण से आए लोगों का योगदान था। 

पापा हम लोगों को फिल्म दिखाने ले जाते थे। पिताजी अक्सर बालकनी का टिकट लेते थे। सलेमपुर के टिकटों की अपनी कहानियाँ थीं। फिल्म के टिकट को लेकर जो बेचैनी होती थी, वह आज के ऑनलाइन बुकिंग वाले समय में समझाना मुश्किल है। टिकट सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं था, वह उस शाम की इज्जत था - मिल गया तो विजय, नहीं मिला तो पूरा दिन खराब।

पहले फर्स्ट क्लास और बालकनी का अपना अलग रुतबा था। फर्स्ट क्लास का टिकट लेने को लेकर भीड़ में झड़पें हो जाती थीं। मैंने तो लिटिल फ्लावर स्कूल की टीचर्स को भी थानेदार फिल्म की फर्स्ट क्लास के टिकट पर लड़ते देखा है।शायद छोटे कस्बों का सिनेमा भी ऐसा ही था—भीड़, गर्मी, धक्का, सीट की लड़ाई, प्रोजेक्टर की गड़बड़ी, फिर भी उसी में असली मजा था। कई बार बड़े लड़के स्कूल बंक करके बैक-टू-बैक शो देख आते थे—एक फिल्म खत्म हुई नहीं कि दूसरी का टिकट पकड़ लिया। उनके लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, पढ़ाई और अनुशासन से चुराया हुआ वह रोमांच था, जिसकी कहानी अगले दिन पूरे स्कूल में फुसफुसाकर सुनाई जाती थी।

जब फिल्म बदलना भी एक घटना होती थी

उस समय कोई भी फिल्म चुपचाप नहीं आती थी। जो भी आती थी, अपनी हैसियत के मुताबिक धूम-धड़ाके से आती थी। फिल्म का लगना ही नहीं, उसका उतरना भी चर्चा का विषय होता था। जाने के बाद भी उसकी बात चलती रहती थी। फिल्म बदलना तब बड़ी घटना होता था। तीन-चार दिन पहले ही पता हो जाता था कि फलाँ फिल्म लगने वाली है। ‘नई’ फिल्म के पोस्टर चिपके हुए बोर्ड गली-गली में घुमाए जाते थे। रिक्शे पर लाउडस्पीकर से अनाउंसमेंट होती थी - आपके अपने शहर में रोज़ाना चार शो —सुबह 12 से 3, दोपहर 3 से 6, शाम 6 से 9 और रात 9 से 12!

मुझे याद है, राजा और रंक का पोस्टर सलेमपुर में देखा था। रिक्शे पर अनाउंसमेंट हो रही थी। शायद जुलाई 1990 की कोई शाम रही होगी। मैं खेल रहा था और अचानक वह आवाज़ हवा में तैरती हुई आई - आपके शहर में…” | उस आवाज़ में किसी मेले जैसा खिंचाव था।  

लगभग बचपन के शुरुआती स्कूली दिनों में, जब मेरी उम्र 6-7 साल रही होगी, सनी देओल और डिंपल कपाड़िया वाली Narsimha के पोस्टर पूरे सलेमपुर में हर जगह चिपके हुए थे। यह एक्शन ड्रामा इतनी लोकप्रिय थी कि गाँव के हर कोने में उसका डंका बज रहा था। सनी देओल की तेज़ संवादबाजी और ओम पुरी के साथ इंटेंस सीन लोगों को बाँध लेते थे। 

फिर दोहरीघाट में नानी के यहाँ जाने पर Ajooba का पोस्टर छुपा सा मिलना—यह भी उसी दौर की बात लगती है। अमिताभ बच्चन की यह फैंटेसी एडवेंचर फिल्म गाँव में छुप-छुपकर लोकप्रिय थी। Ajooba को अमिताभ बच्चन की सुपरहीरो शैली वाली बड़ी कोशिश के रूप में याद किया जा सकता है—सिल्वर मास्क, आर्मर और फैंटेसी लुक के साथ। हालांकि वह बड़ी फ्लॉप रही, लेकिन बच्चों की कल्पना में उसने जगह बनाई।

90s का बॉलीवुड वह दौर था जब Narsimha जैसी हार्डकोर एक्शन फिल्में और Ajooba जैसी फैंटेसी फिल्में साथ-साथ चल रही थीं। गाँवों में पोस्टर पूरे साल तक नहीं हटते थे, क्योंकि लोग बार-बार उन्हें देखते थे। वीडियो कैसेट के दौर में फिल्मों की दूसरी जिंदगी शुरू होती थी—थिएटर से उतरने के बाद भी मोहल्लों और गाँवों में उनका डंका बजता रहता था।

फिल्मों की सूची नहीं, बचपन का कैलेंडर

सलेमपुर और मिर्जापुर में देखी-सुनी वे फ़िल्में मेरे लिए केवल फ़िल्मों के नाम नहीं हैं, बल्कि बचपन के सालों की तारीखें हैं। सलेमपुर में “मैंने प्यार किया” और “हाथी मेरे साथी” जैसी फ़िल्मों से शुरुआत हुई। फिर वहीं “किशन कन्हैया”, “स्वर्ग”, “दिल”, “बाग़ी” और “थानेदार” जैसी फ़िल्मों का शोर सुना और देखा। आगे चलकर सलेमपुर में ही “सनम बेवफ़ा”, “हिना”, “भाभी”, “साजन”, “फूल और काँटे” और “दो रास्ते” जैसी फ़िल्में आईं, जबकि “नौकर बीवी का” और “हम” मिर्जापुर में देखने की स्मृति से जुड़ी रहीं। फिर उसी दौर में सलेमपुर में “विश्वात्मा”, “ज़िंदगी एक जुआ”, “बेटा”, “दीवाना”, “बोल राधा बोल”, “ख़ुदा गवाह” और “बेवफ़ा से वफ़ा” जैसी फ़िल्मों का अपना अलग माहौल बना। 

“ख़ुदा गवाह” हमारे लिए सचमुच एक भव्य सिनेमाई अनुभव था। उस दौर में, जब ज़्यादातर फ़िल्में घर-परिवार, रिश्तों और सास-बहू के दायरों में घूम रही थीं, यह फ़िल्म अफ़ग़ानिस्तान के विशाल, वीरान और खूबसूरत नज़ारों के साथ अलग ही दुनिया रचती थी।  ऊँचे पहाड़, खुले मैदान, घोड़े, कबीलाई शान और अमिताभ बच्चन की भारी मौजूदगी — सब मिलकर इसे सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि एक महाकाव्य जैसा एहसास देते थे। छह साल के बच्चे के लिए “ख़ुदा गवाह” का बुज़कशी वाला दृश्य बड़े पर्दे पर किसी सपने जैसा था — विशाल मैदान, दौड़ते घोड़े और अमिताभ बच्चन की बादशाह जैसी मौजूदगी ने सिनेमा को पहली बार सचमुच विराट बना दिया।


फिल्म देखे बिना भी फिल्म देख लेना

उन दिनों फिल्म देखने का एक और तरीका था—किसी अपने से उसकी कहानी सुन लेना। घर में, आँगन में, चारपाई पर बैठे-बैठे, कोई फिल्म देखकर आता और पूरी कहानी ऐसे सुनाता मानो परदे पर नहीं, उसके भीतर ही फिल्म चल रही हो। मामा जब नाना पाटेकर की आर्मी वाली फिल्म “प्रहार” देखकर आए थे, तब उन्होंने हमें उसकी पूरी कहानी सुनाई थी। मामा खुद उस समय बारहवीं में थे। उनके सुनाने का अंदाज ऐसा था कि हमें लगा जैसे हमने भी फिल्म देख ली हो। नाना पाटेकर का गुस्सा, फौजी अनुशासन, ट्रेनिंग, अन्याय के खिलाफ खड़े होने की बेचैनी—सब कुछ मामा की आवाज़ में उतर आया था। छोटे कस्बों में कई बार फिल्म की दूसरी स्क्रीन यही होती थी—किसी बड़े भाई, मामा, चाचा या दोस्त की जुबान।

“तिरंगा” मैंने हाल में नहीं देखी, पर स्कूल के दोस्तों ने कहानी सुनाई थी, और पात्रों की याद आज भी ताजा है| स्कूल के गलियारों में बताई गई कहानियों के मुताबिक़ राज कुमार ने ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह और नाना पाटेकर ने इंस्पेक्टर शिवाजी राव वागले के रूप में गर्मजोशी भर दिया था। विलेन प्रलयनाथ गेंडास्वामी ने फ़िल्म को उसका खतरनाक चेहरा दिया; उन सबका परिचयात्मक डायलॉग, “पहले लात, फिर बात, फिर मुलाकात” , एक तरह का कल्ट-मोमेंट बन गया। 

फिल्म शुरू होने से पहले और इंटरवल का संसार

मुझे फिल्म से पहले आने वाले Vicco Turmeric के विज्ञापन बहुत पसंद थे। वह विज्ञापन जैसे फिल्मी अनुभव का अनिवार्य हिस्सा था। कभी-कभी फिल्म से पहले डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई जाती थी। मुझे याद है कि राजीव गांधी की मृत्यु पर बनी डॉक्यूमेंट्री भी फिल्म से पहले दिखाई गई थी। उस उम्र में शायद उसकी राजनीतिक गंभीरता समझ नहीं आती थी, लेकिन माहौल की गंभीरता याद रह जाती थी।

सिंगल-स्क्रीन थिएटर में “इंटरवल” सिर्फ़ फ़िल्म रुकने का नाम नहीं था — वह अपने आप में एक छोटा-सा मेला था। जैसे ही पर्दे पर “मध्यांतर” आता, हॉल की अंधेरी दुनिया अचानक रोशनी, शोर और भाग-दौड़ से भर जाती। कोई समोसे की लाइन में लग जाता, कोई ठंडी बोतल लेने भागता, कोई मूंगफली या चना जोर गरम वाले को आवाज़ देता, और बच्चे सीट छोड़कर पोस्टरों के पास खड़े होकर हीरो-हीरोइन को निहारने लगते।

परिवार के साथ फिल्म देखने की असमंजस स्थिति और स्त्री-पुरुष मित्रता

उस दौर के सिनेमा में कई बार ऐसे दृश्य आते थे जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देखना बेहद असहज कर देता था। खलनायकों द्वारा स्त्री पात्रों को लगातार असहाय दिखाना मुझे बहुत खलता था। परिवार के साथ फिल्म देखते समय ऐसे दृश्य एक अजीब-सी चुप्पी पैदा कर देते थे। आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि उस दौर के मसाला सिनेमा में मनोरंजन के साथ-साथ कई गहरे सामाजिक सवाल भी छिपे थे—खासकर यह कि स्त्री पात्रों को अक्सर केवल पीड़ित या बचाए जाने वाली भूमिका में क्यों रखा जाता था। 

मैंने प्यार किया ने सिर्फ प्रेम कहानी नहीं दी, उसने एक सवाल भी दिया—क्या लड़का और लड़की केवल दोस्त हो सकते हैं? उस दौर के छोटे शहरों में यह प्रश्न बड़ा था। दोस्ती, प्रेम, मर्यादा और समाज—इन सब पर चर्चा छिड़ती थी। फिल्मों ने कई बार समाज से पहले सवाल पूछे। दर्शक हॉल से बाहर निकलकर उन सवालों को अपने जीवन में ढोते थे। यही सिनेमा की असली ताकत थी।

कांति शाह, ‘फूलन हसीना रामकली’ और प्रोजेक्टर वाले की डाँट

छोटा शहर था, इसलिए रिश्ते भी जल्दी बन जाते थे। धीरे-धीरे मेरे माता-पिता की मेनका थिएटर के मालिक से जान-पहचान हो गई। उनका घर सिनेमा हॉल के ऊपर ही था। एक बार मैं भी उनके घर मिलने गया। बड़े लोग अपनी बातों में लग गए और मैं कुछ देर बाद बोर होने लगा। 

बचपन में बोरियत भी किसी रोमांच का रास्ता खोल देती है। मैं चुपचाप उनके घर से निकलकर इधर-उधर टहलते हुए प्रोजेक्टर रूम की तरफ चला गया। नीचे हॉल में कांति शाह की फिल्म फूलन हसीना रामकली’ चल रही थी। वह जमाना था जब छोटे शहरों के सिनेमाघरों में कुछ फिल्मों के लिए बच्चों को सख्त मना किया जाता था, और ऐसी फिल्मों के इर्द-गिर्द बच्चों के मन में एक अलग तरह की जिज्ञासा बन जाती थी।

मैंने बस दो मिनट झाँक लिया था। नीचे परदे पर गाना और एक्शन चल रहा था, और ऊपर से प्रोजेक्टर की रोशनी के बीच फिल्म को देखना अपने-आप में किसी चोरी के सुख जैसा लगा। दिल धक-धक करने लगा—आधा डर, आधी उत्सुकता। लेकिन यह रोमांच ज्यादा देर टिक नहीं पाया। प्रोजेक्टर वाले ने मुझे देख लिया और तुरंत भगा दिया। डंडे की मार से बचते हुए वहाँ से भागना पड़ा।

सालों बाद जब Cinema Paradiso देखी, तो मुझे अपनी वही घटना याद आ गई। वह फिल्म सिनेमा की जादुई दुनिया की कहानी थी, और मेरी याद तो चोरी की नजरों वाली थी। वहाँ भी प्रोजेक्टर रूम, बच्चा और सिनेमा का आकर्षण था; फर्क बस इतना था कि मेरी कहानी में इटली का रोमांस नहीं, सलेमपुर का कस्बाई डर, जिज्ञासा और प्रोजेक्टर वाले की डाँट थी। उस दिन समझ नहीं आया था, लेकिन आज लगता है कि सिनेमा सिर्फ परदे पर नहीं चलता था। वह ऊपर प्रोजेक्टर रूम में भी चलता था, टिकट खिड़की पर भी और उन बच्चों की आँखों में भी  जो मनाही के बावजूद थोड़ी-सी रोशनी चुरा लेना चाहते थे। 

अंत में: सलेमपुर से कानपुर तक

सिंगल स्क्रीन थिएटर केवल फिल्म दिखाने की जगह नहीं थे। वे छोटे शहरों की सामूहिक स्मृति थे। वहाँ दर्शक केवल दर्शक नहीं होते थे—वे फिल्म के साथ जीते थे, ताली बजाते थे, सीटियाँ मारते थे, असहज होते थे, हँसते थे, डरते थे, और कई बार फर्स्ट क्लास टिकट के लिए लड़ भी पड़ते थे। मेनका टॉकीज़ जैसे सिनेमा हॉल ने केवल फिल्में नहीं दिखाईं; उन्होंने एक पीढ़ी को सपने देखने का तरीका सिखाया। सलेमपुर की गलियों, रिक्शे पर होते अनाउंसमेंट, पोस्टरों, टिकट की लाइन और बालकनी की सीटों से शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे दूसरे शहरों तक पहुँची। 

90s के टियर-2 शहरों में बड़ा होना एक अलग ही स्वाद था, खासकर कानपुर जैसे शहरों में जहाँ मल्टीप्लेक्स का सपना भी दूर था। मंजूश्री, गुरुदेव-पम्मी के अलावा नवरंग, हीर पैलेस, श्याम पैलेस और दर्जनों सिंगल-स्क्रीन हॉल्स थे — कभी 37 से ज्यादा चलते थे ये सिनेमा महल! । देवकी पैलेस, जिसका निर्माण 1978 को पूरा हुआ था, बनते समय उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा सिनेमा हॉल था—जिसकी बैठने की क्षमता 1000+ सीटें और स्क्रीन की चौड़ाई 80 फीट थी। मल्टीप्लेक्स न होने से लाइनें लगतीं, लेकिन वो भीड़ और मटर चाट का मज़ा आज भी याद है। PPN Market/Parade के आस-पास का इम्पीरियल टॉकीज़ का जैसे नाम भी उसी दौर की यादों से जुड़े लगते हैं—जहाँ पोस्टरों, हॉल के नामों और ‘Adult’ लिखे बोर्डों में बच्चों के लिए एक रहस्यलोक छिपा रहता था। समझ कम थी, जिज्ञासा ज्यादा थी, और डांट खाने का जोखिम हमेशा साथ चलता था। आगे चलकर जब कानपुर में Rave Talkies खुला, तो उसका जलवा ही अलग था। हमारे लिए वह सिर्फ़ सिनेमा हॉल नहीं था, बल्कि शहर के बड़े होने का प्रमाण था। और पढ़ें : Kings without an audience -the fate of single screen cinemas of Kanpur

फिर कानपुर का दौर आया। गुरुदेव सिनेमा में Jurassic Park देखी, और सच कहूँ तो उस समय डर के मारे हालत खराब हो गई थी। डायनासोर को हिंदी में ‘सरिसृप’ बोलते थे—और हमारे लिए तो डायनासोर नाम की चीज़ लगभग न के बराबर जानकारी वाली रहस्यमयी प्रजाति थी। पर्दे पर इतने बड़े-बड़े जीवों को चलते, दहाड़ते और लोगों के पीछे भागते देखना किसी अजूबे से कम नहीं था। वह डर भी सिनेमा का हिस्सा था—ऐसा डर जो बाद में याद बनकर मजेदार लगने लगता है। कानपुर में ही मंजुश्री सिनेमा में Hum Aapke Hain Koun..! देखी। वह एक अलग अनुभव था—परिवार, गीत, रिश्ते, शादी-ब्याह और रंग-बिरंगे उत्सवों से भरी हुई फिल्म। लेकिन शायद उसके बाद जीवन की दिशा धीरे-धीरे बदलने लगी। कई साल तक फिर फिल्में देखने का सिलसिला वैसा नहीं रहा। 

Golden Eye या Tomorrow Never Dies

बचपन में फिल्मों को लेकर भी हमारी समझ बड़ी मासूम थी। कानपुर में 1996 या 1997 के आसपास James Bond की कोई फिल्म लगी थी। पोस्टर देखकर बस इतना समझ आया कि बड़ा ही जबरदस्त मामला है—हीरो सूट में है, बंदूक है, गाड़ी है, अंग्रेज़ी नाम है; यानी देखनी ही है। मैंने घर में बहुत ज़िद की। पापा पहले तो समझाते रहे कि यह बच्चों वाली फिल्म नहीं है, लेकिन बच्चा जब ज़िद पर आ जाए तो तर्क उसके कानों तक पहुँचते कहाँ हैं। मुझे लग रहा था कि पापा बस यूँ ही मना कर रहे हैं।

फिर राठौर अंकल आए। उन्होंने दो मिनट में परिस्थिति समझ ली और मुझे उसी गंभीरता से समझाया जैसे कोई संयुक्त राष्ट्र में संकट टाल रहा हो। बोले, “बेटा, यह बड़े लोगों की फिल्म है।” बस, उनके कहने का असर कुछ ऐसा हुआ कि मामला वहीं ठंडा पड़ गया। बाद में समझ आया कि पापा जो बात घुमा-फिराकर नहीं समझा पा रहे थे, राठौर अंकल ने एक लाइन में समझा दी थी। उस उम्र में “बड़े लोगों की फिल्म” अपने आप में सेंसर बोर्ड का अंतिम फैसला होता था—ना अपील, ना बहस, ना अगला शो।

आज सोचता हूँ तो हँसी आती है। उस दौर में बच्चों को हर बात विस्तार से नहीं समझाई जाती थी। कुछ चीज़ों पर बस मुहर लग जाती थी - “ये तुम्हारे लिए नहीं है।” और हम मान भी जाते थे, क्योंकि घर में पिता की बात के बाद अगर मोहल्ले के अंकल भी वही बात कह दें, तो समझो फैसला सुप्रीम कोर्ट से आ गया।

निष्कर्ष

कानपुर आने के बाद पिताजी का फिल्म देखने का शौक भी कम होता गया, और हमारी पढ़ाई पर भी ध्यान आ गया। सिनेमा जो पहले परिवार की सामूहिक outing हुआ करता था, वह धीरे-धीरे स्मृति में बदलने लगा। मेनका टॉकीज़, गुरुदेव, मंजुश्री—ये सब किसी पुराने एलबम के अलग-अलग पन्नों की तरह रह गए। प्यार और स्मृति भी शायद ऐसे ही होते हैं—बवंडर की तरह आते हैं, भीतर सब कुछ हिला देते हैं, और फिर अचानक शांत हो जाते हैं। पीछे बस कुछ दृश्य बचते हैं, कुछ नाम, कुछ आवाजें, कुछ गाने, कुछ टिकट, कुछ गलियाँ। जीवन के सफर में जो पड़ाव गुजर जाते हैं, वे सचमुच फिर उसी रूप में नहीं आते। लेकिन सिनेमा उन्हें पूरी तरह जाने भी नहीं देता।

मेनका टॉकीज़ जैसे सिनेमा हॉल ने केवल फिल्में नहीं दिखाईं; उन्होंने एक पीढ़ी को सपने देखने का तरीका सिखाया। आज मल्टीप्लेक्स, ओटीटी और मोबाइल स्क्रीन के दौर में भी वह सिंगल स्क्रीन—उसकी बालकनी, उसका प्रोजेक्टर, उसका पोस्टर, उसका रिक्शा अनाउंसमेंट—मन में अब भी चलता रहता है। शायद सिनेमा कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता। वह हॉल से उतरकर स्मृति में लग जाता है—और वहाँ उसका शो हमेशा चलता रहता है। 

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