एक बूँद सहसा उछल जाती है, और रुके हुए पानी में गतिमान तरंग बनती हैं.. एक ऐसा ही प्रयास है यह....
जब टीवी हमारी दुनिया की खिड़की था
Get link
Facebook
X
Pinterest
Email
Other Apps
सच कहूँ तो इक दौर में दूरदर्शन सिर्फ़ एक चैनल नहीं था, वह हमारी दुनिया की खिड़की था। वही खबरें थीं, वही कहानियाँ थीं, वही हँसी थी और वही इंतज़ार था। वास्तविकता और कल्पना की सीमाएँ साफ़ थीं; जो दिखता था, वह सबका साझा अनुभव बन जाता था। एक ही कार्यक्रम पर चर्चा घर-गली में एक जैसी चल पड़ती थी और बातचीत का रंग भी उससे जुड़ जाता था। विज्ञापन भी यादगार होते थे—छोटी-छोटी चीज़ें सामूहिक यादों में बस जाती थीं।
दूरदर्शन टीवी धारावाहिक
नब्बे के दशक के बच्चों के सहनशील होने की बड़ी वजह यही थी कि वे दूरदर्शन पर अपने पसंदीदा धारावाहिक देखने के लिए आने वाली उबाऊ खबरों—हिंदी, अंग्रेज़ी, यहाँ तक कि रविवार विशेष मूक-बधिर समाचार और संस्कृत समाचार—को भी हँसते हुए झेल लेते थे। दोपहर का दूरदर्शन अपने आप में एक पूरी नियमित कार्यक्रम-सारिणी था—जैसे जीवन का सरकारी कैलेंडर।
बारह बजे ‘औरत’, साढ़े बारह बजे ‘अपराजिता’, एक बजे ‘वक़्त की रफ़्तार’, डेढ़ बजे ‘इतिहास’, दो बजेअंग्रेज़ी और हिंदी समाचार, ढाई बजे ‘शांति: एक घर की कहानी’, तीन बजे ‘युग’ और साढ़े तीन बजे ‘स्वाभिमान’। उन्नीस सौ नब्बे के दशक में दूरदर्शन प्रेमियों की दोपहर कुछ इसी नियमित ताल में बीतती थी।
दूरदर्शन सिर्फ़ धारावाहिक और फ़िल्में नहीं था, वह राजनीति और समसामयिक घटनाओं की हमारी पहली पाठशाला भी था। चुनाव आते तो प्रणय रॉय और उनके चुनाव विश्लेषण का इंतज़ार रहता। रंग-बिरंगे ग्राफ़िक्स तो नहीं होते थे, लेकिन उनकी बातों में ऐसा आकर्षण था कि सीटों का गणित भी रोचक लगने लगता था।
और फिर जब किसी बड़े नेता का निधन हो जाता, तो घर के बच्चों के लिए वह राष्ट्रीय शोक का मतलब था। 25 दिसंबर 1994 में जब पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह का निधन हुआ, तो दूरदर्शन का पूरा माहौल बदल गया। राजकीय शोक, गंभीर संगीत, विशेष कार्यक्रम और बदला हुआ प्रसारण। देश शोक मना रहा था, लेकिन हम जैसे बच्चों को बस इतना समझ आता था कि जाड़े की छुट्टी के सारे मज़ेदार कार्यक्रम गए और टीवी बहुत उबाऊ हो गया है।
बचपन की यह भी एक मासूम याद है कि राष्ट्रीय महत्व की घटनाओं की गंभीरता से ज़्यादा चिंता इस बात की होती थी कि कहीं रविवार की फ़िल्म या पसंदीदा कार्यक्रम रद्द न हो जाए।
बचपन का जादू
शक्तिमान का भी अपना जादू था। जैसे ही कानों में वह ध्वनि गूँजती - “शक्ति शक्ति शक्तिमान, शक्तिमान शक्तिमान” तो मन को एक अलग सी खुशी मिलती थी। शक्तिमान का शीर्षक गीत इतना अच्छा बना था कि आजकल के कई गीत भी वैसी ऊर्जा नहीं दे पाते।
बचपन की यादें बड़ी अजीब होती हैं। कई बार हम कोई संवाद, गीत या नारा ठीक उसी तरह नहीं सुनते जैसे वह असल में बोला गया होता है। फिर भी वही गलत-सुना हुआ वाक्य हमारे दिमाग में हमेशा के लिए बस जाता है।
ही-मैन कार्टून धारावाहिक की शुरुआत में वह बोलता था - “बाय द पावर ऑफ़ ग्रेस्कल… आई हैव द पावर!” मुझे बचपन में कुछ-कुछ “बाय द पावर ऑफ़ रास्कल… आई हैव द पावर!” जैसा सुनाई देता था। आज सोचता हूँ तो गलत सुनी हुई पंक्ति पर हँसी भी आती है और थोड़ी नॉस्टैल्जिया भी। उस समय अंग्रेज़ी शब्दों की समझ कम थी, लेकिन टीवी पर जो भी आता था, वह अपने आप में जादू जैसा लगता था।
चित्रहार और रंगोली
चित्रहार और रंगोली तो हफ्ते का इंतज़ार हुआ करते थे। वी.सी.आर. और कैसेट के साथ-साथ दूरदर्शन का भी अपना स्वर्ण युग था। रविवार की सुबह रंगोली और हफ्ते के बीच में चित्रहार—ये सिर्फ़ कार्यक्रम नहीं थे, परिवार के साथ बैठकर गाने देखने का समय था। उस समय मनपसंद गाना टीवी पर आ जाए तो खुशी अलग होती थी। कोई आवाज़ लगाता- “जल्दी आओ, ये गाना आ रहा है!” और घर के लोग भागकर टीवी के सामने जमा हो जाते।
बचपन के दिनों में टीवी पर नायक-नायिका के नाम मैं मम्मी से पूछता रहता था। कभी वह कहतीं—“मिथुन”, तो कभी - “मिथुन चक्रवर्ती।” मुझे लगता ये दोनों अलग-अलग इंसान हैं।
एक दिन मिथुन स्क्रीन पर डिस्को नाच करते आते हैं, दूसरे दिन मिथुन चक्रवर्ती ऐक्शन करते हुए आ जाते हैं। यह भ्रम इतना गहरा था कि मैं सोचता, मम्मी गलत बता रही हैं या फिर टीवी वाले दो नायक बना रहे हैं!
रविवार दोपहर की क्षेत्रीय फ़िल्में
रविवार दोपहर की अपनी अलग दुनिया थी। बाहर धूप छनकर आ रही हो, घर में खाने की महक हो, और टीवी पर क्षेत्रीय फ़िल्में—तमिल, तेलुगु, मलयालम, मराठी वाली—जो कभी-कभी हिंदी में डब होकर या अपने मूल रूप में भी आ जाती थीं।
‘रोजा’ तो कमाल की मिसाल है। पहले तमिल में क्षेत्रीय फ़िल्म वाली श्रेणी में दूरदर्शन पर आई, मणि रत्नम का जादू था। मैंने कम समझ के साथ देख ली | जब पंद्रह अगस्त 1993 को हिंदी में आई तो जैसे अपनी ही फ़िल्म लगने लगी। मैं बैठा-बैठा दृश्य पहले ही बता देता - “अब ये गाना आएगा, अब वह नायिका भागेगी!” एक तरह से अनुमान लग रहा होता था, क्योंकि दृश्य देखते ही पहचान जाते थे। पहली और आख़िरी असमिया फ़िल्म जो देखी, वह थी 'हलोधिया चराये बाओधान खाय', और वह भी दूरदर्शन पर। भारतीय सिनेमा का मेरा पहला "मल्टीवर्स" सिनेमाघरों ने नहीं, दूरदर्शन ने रचा था।
शायद वही दूरदर्शन की ताकत थी—वह हमें सिर्फ़ हिंदी सिनेमा नहीं दिखाता था, बल्कि अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों की कहानियों से भी चुपचाप परिचित करा देता था।
दूरदर्शन पर पंद्रह अगस्त की फ़िल्में
दूरदर्शन के दौर में पंद्रह अगस्त का मतलब था सुबह लाल किले की प्राचीर, दोपहर में देशभक्ति गीत और शाम को मनोज कुमार, दिलीप कुमार या भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर बनी कोई फ़िल्म। उस दिन पूरा घर टीवी के सामने ऐसे बैठता था जैसे यह भी आज़ादी के जश्न का एक हिस्सा हो।
फिर एक दिन आया—पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ छियानवे। दूरदर्शन पर ‘शोले’ उसकी इक्कीसवीं सालगिरह के मौके पर दिखाई गई थी। उस दिन पूरा बाज़ार सूना हो गया था, क्योंकि लोग घर बैठकर रात भर शोले देखने लगे थे। पिताजी सख्त थे। “पढ़ो-लिखो, स्कूल का काम पूरा करो, फिर देखो!” कहकर उन्होंने पूरे हफ्ते मुझे अनुशासन में रखा। स्कूल से लौटते ही किताबें थमा दी जातीं, लेकिन मन तो शोले में अटका रहता ।
फिर वह जादुई शाम आई। हफ्ता बीता, डाँट-पिटाई थमी। पिताजी ने अचानक इज्ज़त से बुलाया—"आ जाओ बेटा, शोले देख लो।” दिल की धड़कन रुक सी गई।
दूरदर्शन की पुरानी पेटी
साई परांजपे का बनाया वह सादा सा लेकिन दिल छू लेने वाला धारावाहिक ‘हम पंछी एक चाल के’ आज भी याद आते ही चेहरे पर हल्की मुस्कान ले आता है। सच यह है कि दूरदर्शन की पुरानी पेटी में एक से एक अनमोल हीरे पड़े हैं। कौन सा अच्छा है, कहना थोड़ा कठिन ज़रूर है; फिर भी लोग अपनी पसंद के अनुसार याद ताज़ा करते रहते हैं।
दूरदर्शन के धारावाहिकों में अच्छे-बुरे सब थे। और कभी-कभी लगता है कि उन पर भी वही मुहावराu लागू होता है- “सब धान बाईस पसेरी”। इसका अर्थ है अच्छे और बुरे सबको एक समान समझ लेना, किसी की योग्यता और मूल्य को न आँककर सबको एक ही तराजू में तौल देना। बोरियत का सामना करने के लिए दूरदर्शन ही एकमात्र सहारा था। विकल्पों की कमी ने हमें वही देखने और उसी से जुड़ने का हुनर सिखाया था।
लेकिन सच कहें तो उस दौर के कमजोर कार्यक्रम भी आज की कई चमकदार चीज़ों से ज़्यादा अपने लगते हैं।
डी.डी. मेट्रो नाइन गोल्ड: छोटे पर्दे का अधूरा सुनहरा दौर
कानपुर में 1995 में डी.डी. मेट्रो का आना किसी छोटे-मोटे चमत्कार से कम नहीं था। आज के दौर में जब मोबाइल पर हर चीज़ तुरंत मिल जाती है, तब यह समझना मुश्किल है कि एक नए चैनल का आ जाना भी कभी शहर के सांस्कृतिक जीवन में घटना जैसा होता था। दूरदर्शन के सीमित संसार में डी.डी. मेट्रो एक नई खिड़की था | केबल टेलीविज़न हर घर में नहीं था, इंटरनेट था नहीं, और बोरियत से लड़ने के लिए दूरदर्शन ही सबसे भरोसेमंद साथी था।
फिर आया डी.डी. मेट्रो का नाइन गोल्ड / मेट्रो गोल्ड वाला दौर। यह समय बहुत लंबा नहीं चला, लेकिन जितना चला, उसने टेलीविज़न देखने की आदत बदल दी। यह डी.डी. मेट्रो का वह दौर था जब शामें अचानक ज़्यादा चमकदार लगने लगी थीं। धारावाहिकों, पारिवारिक कहानियों, हास्य कार्यक्रमों, डरावनी कहानियों, प्रतिभा खोज कार्यक्रमों और टेलीफ़िल्मों की एक पूरी दुनिया खुल गई थी।इसने मनोरंजन को थोड़ा आधुनिक, थोड़ा तेज़ और थोड़ा प्रयोगधर्मी बनाया। इसमें ‘कुंडली’, ‘कविता’, ‘मान’, ‘पिया बिना’, ‘मेरी मिसेज चंचला’, ‘चोंच लड़ी रे चोंच’, ‘सामने वाली खिड़की’, ‘टेंढ़े-मेढ़े सपने’, 'फंटूश' जैसे कई कार्यक्रम आए, जिनमें से कुछ बाद में दूसरे चैनलों पर भी दिखे या लोगों की यादों का हिस्सा बने रहे।
इस दौर की सबसे खास बात यह थी कि यह सिर्फ़ धारावाहिकों का समय नहीं था; यह छोटे पर्दे पर सिनेमाई प्रयोगों का भी समय था। डायरेक्टर्स कट जैसे कार्यक्रमों में दो घंटे की टेलीफ़िल्में दिखाई जाती थीं। हर हफ्ते एक नई कहानी आती थी—कभी भावुक, कभी रहस्यमय, कभी रिश्तों पर आधारित, कभी ऐसी कि देखने के बाद देर तक मन में चलती रहती थी। इन टेलीफ़िल्मों में बड़े पर्दे वाली भव्यता नहीं थी, लेकिन उनमें सिनेमा जैसा असर था।
रविवार का इंतज़ार
रविवार सचमुच किसी त्योहार से कम नहीं होता था। पूरे हफ़्ते बस इसी इंतज़ार में कटते थे कि रविवार आएगा, अगली कड़ी आएगी, कोई नई फ़िल्म आएगी, और फिर कुछ घंटों के लिए पूरा घर टेलीविज़न के सामने जमा हो जाएगा।
चार बजे वाली पिक्चर अपने आप में अलग ही घटना थी। सुबह से ही मन में हलचल शुरू हो जाती थी। अगर दिन में एक-दो घंटे टेलीविज़न देख लिया हो, तो घर में दोपहर तक जगह पक्की करना मुश्किल हो जाता था। कई बार तो टेलीविज़न वाले कमरे के चक्कर ऐसे लगाने पड़ते थे, जैसे परवाना रोशनी के आस-पास मंडराता है। मन में बस यही डर रहता था कि कहीं फ़िल्म शुरू न हो जाए, कहीं शुरुआत छूट न जाए।
उस दौर में बच्चों के लिए जो थोड़े-बहुत भारतीय बने कार्यक्रम आते थे, वही हमारी पूरी दुनिया थे। ‘चंद्रकांता’ जैसा कल्पना-लोक वाला धारावाहिक फिर कभी नहीं बना। पौराणिक धारावाहिक बहुत बने, लेकिन ‘चंद्रकांता’ जैसा रहस्य, तिलिस्म और दीवानगी वाला आकर्षण अलग ही था। ‘हातिम ताई’, ‘बेताल’ और ‘अलिफ़ लैला’ भी प्रिय थे, लेकिन वह पागलपन, वह इंतज़ार, वह अगली कड़ी की बेचैनी—वह कहीं और नहीं मिली।
दूरदर्शन और डी.डी. मेट्रो के साथ यही तो जादू था। कभी अचानक कोई धारावाहिक, कोई टेलीफ़िल्म, कोई गीत, कोई शीर्षक धुन ऐसी आ जाती थी कि कई साल बाद भी दिमाग़ में बजती रहती है। ‘अजनबी’ धारावाहिक का संगीत आज भी बचपन में यूँ पैबस्त है, जैसे ज़िंदगी में सुख-दुख पैबस्त रहते हैं। श्वेत-श्याम टेलीविज़न पर दूरदर्शन के ज़रिए आती हुई वे धुनें आज भी कानों में कहीं अटकी रह जाती हैं।
आज जब उन कार्यक्रमों को खोजता हूँ, तो कभी कुछ मिल जाता है, कभी नहीं। और जब अचानक कोई पुराना दृश्य सामने आ जाता है, तो आँखें भर आती हैं। लगता है, क्या सुनहरे दिन थे वे! रविवार का वह इंतज़ार, चार बजे वाली पिक्चर, अगली कड़ी की बेचैनी और टेलीविज़न की नीली रोशनी में बैठा पूरा घर—अब तो जैसे पूरी दुनिया की काया ही पलट गई है।
ऐंटेना, नेपाल चैनल और झिलमिलाती तस्वीरें
मुझे बचपन याद आता है, सलेमपुर में जब हमारे यहाँ सिर्फ़ एक दूरदर्शन था और लटककर ऐंटेना घुमा-घुमाकर हम नेपाल का चैनल पकड़वाया करते थे। छत पर कोई ऐंटेना घुमा रहा होता, नीचे से आवाज़ आती - “बस-बस, अब साफ़ आ रहा है!”
कभी स्क्रीन पर दाने आते, कभी तस्वीर झिलमिलाती, कभी आवाज़ दूर से आती हुई लगती। यही उस युग की तकनीक थी और यही परिवार का सामूहिक श्रम भी था। नेपाल की तरफ से कभी-कभी PTV के चैनल भी पकड़ में आ जाते थे। उनके धारावाहिकों की गुणवत्ता काफी अच्छी लगती थी। कहानियों में सादगी थी, अभिनय दमदार होता था और बिना किसी तामझाम के भी वे दर्शकों को बांधे रखते थे। झिलमिलाती तस्वीरें, हिलती स्क्रीन और ऐंटेना के सहारे आती आवाज़ें—इन सबमें नब्बे के दशक की उस दुनिया की झलक थी, जहाँ तकनीक सीमित थी, पर हर दृश्य में बचपन की मासूमियत और मधुर स्मृति बसी थी।
'मिस्टर इंडिया’ मेरी सबसे मनपसंद फिल्मों में थी। लेकिन किस्मत ऐसी कि जब भी दूरदर्शन पर आती बिजली चली जाती थी। कभी रात में देखने की अनुमति नहीं थी, कभी दिन में बिजली नहीं होती थी, कभी गाँव की यात्रा में व्यस्त रहा। बस यही हाल था—जब चाहा तो बिजली गायब, और जब बिजली आई तो मौका न लगा। आखिरकार, वह अदृश्य होने वाली फ़िल्म मेरी जिंदगी की तरह ही गायब हो गई।
समानांतर सिनेमा से पहली मुलाक़ात
दूरदर्शन ने हमें सिर्फ़ मनोरंजन नहीं दिया, उसने हमारी दुनिया का दायरा भी बढ़ाया। आज जिसे समानांतर सिनेमा कहा जाता है, उससे मेरा पहला परिचय भी दूरदर्शन के माध्यम से ही हुआ। श्याम बेनेगल की "जुनून" जैसी फ़िल्में उस समय समझ में भले पूरी न आती हों, लेकिन उनके दृश्य और भावनाएँ मन में गहरे उतर जाते थे। "जुनून" में पहली बार इतने विदेशी चेहरे देखे थे। चर्च में हिंसा का वह दृश्य आज भी स्मृति में कहीं दर्ज है। इसी तरह "न्यू दिल्ली टाइम्स" जैसी राजनीतिक फ़िल्में भी पहली बार दूरदर्शन पर ही देखीं। राजनीति, सत्ता, मीडिया और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर बनी ऐसी फ़िल्में उस समय बच्चों की समझ से परे थीं, लेकिन वे यह एहसास ज़रूर कराती थीं कि दुनिया सिर्फ़ हीरो-विलेन और गीत-संगीत तक सीमित नहीं है
खबरों की दुनिया
‘आज तक’ और ‘आँखों देखी’ जैसे कार्यक्रमों ने समाचारों को घर का हिस्सा बना दिया था। ‘तीन ताल’ के प्राचीन इतिहास की कड़ियाँ जोड़ते-जोड़ते बात सुरेन्द्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. सिंह तक पहुँच जाती है। दूरदर्शन के दिनों में शनिवार रात प्रसारित होने वाला ‘आज तक’ सिर्फ़ एक समाचार बुलेटिन नहीं था, बल्कि भारतीय टीवी पत्रकारिता का एक नया अध्याय था। एस.पी. सिंह की आवाज़, उनका अंदाज़ और खबरों को पेश करने का उनका तरीका आज भी स्मृतियों में दर्ज है। आज के चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनलों के दौर में यह याद करना दिलचस्प है कि ‘आज तक’ की शुरुआत दूरदर्शन के एक साप्ताहिक कार्यक्रम के रूप में हुई थी।
केबल टीवी
लखनऊ जाना अपने आप में मेरे लिए एक बड़ी घटना होती थी। वहाँ पहुँचते ही पता चलता था कि नाना के बड़े भाई (जिन्हें हम नाना ही कहते थे) के घर केबल टीवी लगा है।छोटे शहर के बच्चों के लिए 90 के दशक में केबल टीवी किसी जादू से कम नहीं था।हमारे लिए यह किसी जादुई दुनिया के दरवाज़े खुलने जैसा था। दूरदर्शन के दो-चार चैनलों से निकलकर अचानक Zee TV, Sony, Star Plus और MTV की दुनिया सामने आ जाती थी।रंगीन टीवी में केबल का दौर ही कुछ और था। ज़ी और सोनी नेटवर्क के कार्यक्रम शुरू होने से पहले आने वाले उनके प्रोमो, लोगो एनीमेशन और जिंगल भी किसी उत्सव से कम नहीं लगते थे। स्क्रीन पर रंग, संगीत और नई दुनिया का एहसास—सब कुछ इतना नया था कि विज्ञापन भी पूरे मन से देखे जाते थे।
सोनी मनोरंजन टेलीविज़न पर नब्बे के दशक के अंत में ‘आई ड्रीम ऑफ़ जीनी’ और ‘डेनिस द मेनेस’ भी आते थे। हम उन्हें अपने हिसाब से याद रखते थे—कभी “आई लव यू जीनी” कह देते, कभी पात्रों के नाम से पहचानते।
90 के दशक में 'ज़ी हॉरर शो' और बाद में सोनी का 'आहट' भारतीय टीवी हॉरर के लिए वैसा ही बदलाव लेकर आए थे जैसा रामसे ब्रदर्स की फिल्मों ने सिनेमाघरों में किया था। ज़ी टीवी पर 1998 में ‘वो’ आया था—स्टीफ़न किंग के उपन्यास ‘IT’ का हिंदी धारावाहिक रूपांतरण, बावन कड़ियों वाला डरावना-रोमांचक कार्यक्रम। इसमें लिलिपुट ने "वो" नाम के डरावने जोकर/आत्मा का किरदार निभाया था, जबकि आशुतोष गोवारीकर भी प्रमुख भूमिका में थे। 90 के दशक के बच्चों के लिए यह सीरियल काफी डरावना माना जाता था।
ज़ी टीवी पर इरफ़ान के धारावाहिक ‘नया दौर’ का विज्ञापन भी याद आता हैं। ‘नया दौर’ के बारे में सुना कि वह भगवती चरण वर्मा के हिंदी उपन्यास ‘सबहिं नचावत राम गोसाईं’ पर आधारित बताया जाता है। और इसका निर्देशन मशहूर फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने किया था।
इसी दौर को समझने के लिए स्टार बेस्टसेलर्स को भी याद करना ज़रूरी है। यह डी.डी. मेट्रो का कार्यक्रम नहीं था, लेकिन वह उसी समय की टेलीविज़न संस्कृति का हिस्सा था। यह एक कहानी-संग्रह धारावाहिक था, जिसमें हर कड़ी में अलग कहानी, अलग कलाकार और अलग निर्देशक होता था।
उस समय शायद हमें अंदाज़ा नहीं था कि जिन नामों को हम छोटे पर्दे पर देख रहे हैं, वही आगे चलकर हिंदी सिनेमा की भाषा बदल देंगे। इस श्रृंखला में अनुराग कश्यप, इम्तियाज़ अली, श्रीराम राघवन, तिग्मांशु धूलिया जैसे नाम दिखाई देते हैं। कुछ कड़ियों में इरफ़ान खान, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, के.के. मेनन और संजय मिश्रा जैसे कलाकार भी दिखे। ‘लास्ट ट्रेन टू महाकाली’ जैसी कड़ियों ने यह दिखाया कि टेलीविज़न भी सिनेमाई हो सकता है। तिग्मांशु धूलिया की कड़ियों में छोटे शहरों की भाषा और किरदारों की अपनी मिट्टी थी। श्रीराम राघवन जैसे निर्देशकों ने रहस्य और अपराध को अलग अंदाज़ में पेश किया। इम्तियाज़ अली जैसे नाम बाद में प्रेम और सफ़र की कहानियों के लिए जाने गए, लेकिन उनकी शुरुआती झलक भी इसी दौर में दिखाई देती है।
आज की स्क्रीन बनाम तब की साझा दुनिया
आज जब अपने बच्चों को उस दौर के कार्यक्रम दिखाने के लिए खोजता हूँ, तो कभी कुछ मिल जाता है, कभी नहीं। कुछ यूट्यूब पर हैं, कुछ किसी फ़ेसबुक पेज पर, कुछ सिर्फ़ स्मृति में। कुछ टेलीफ़िल्में ऐसे गायब हैं जैसे कभी बनी ही न हों।
लेकिन सवाल उपलब्धता का नहीं है। सवाल उस भाव का है, जो उस समय टीवी के सामने बैठते हुए बनता था। दूरदर्शन ने सिर्फ़ कार्यक्रम नहीं दिखाए; उसने हमारे घरों में इंतज़ार, धैर्य, साझा हँसी, सामूहिक चुप्पी और पारिवारिक दर्शन का संस्कार बनाया।
मिलेनियल पीढ़ी शायद सबसे नॉस्टैल्जिक पीढ़ी है। वह उस जगह के लिए उदास है जो कभी अस्तित्व में ही नहीं थी—क्योंकि वह जगह नहीं, वह ज़माना था। इतने बरसों में दुनिया कितनी बदल गई है। दूरदर्शन के अनमोल दौर से आज के वाहियात, बेकार, फूहड़ धारावाहिकों तक हम कहाँ से कहाँ आ गए।
अंतिम स्मृति
दूरदर्शन सिर्फ़ चैनल नहीं था, वह बचपन का धड़कता हुआ संग्रहालय था। झिलमिलाती स्क्रीन, हिलता ऐंटेना, बैटरी बचाने की चिंता, समाचार झेलते बच्चे, रविवार की फ़िल्म का इंतज़ार, पिताजी की डाँट, पूरे परिवार का एक कमरे में बैठना—इन सबने मिलकर हमारी पीढ़ी को बनाया।
अब तो पूरी दुनिया की काया पलट गई है। लेकिन जब भी कहीं कोई पुरानी शीर्षक धुन, पुराना धारावाहिक, पुरानी टेलीफ़िल्म या दूरदर्शन का चिह्न दिख जाता है, तो लगता है जैसे बचपन ने फिर से दरवाज़ा खोला है और धीमे से कहा है - “चलो, आज फिर सब साथ बैठकर टीवी देखते हैं।”
Memories of coaching days at Kanpur are inseparable from me. I have done a separate post on Kanpur coaching mandi only. The most remembered image of my coaching days was the advertisement of Ankush Bhatia by Pran classes, and it was pasted on each wall of Kanpur. His photo was spread at distant corners of the city, showing All India Rank 51. Never seen any local marketing campaign like this. Sometimes, I recall the rush of students from one coaching center to another for seat capture, xerox copying of assignments, and 'out-of-course' study material. The JEE course was never completed on time in the Kanpur coaching mandi. At the end of March, the mad rush to complete the course began with various test series taking place simultaneously. I could not forget that pressure till now. I will never forgive Anish, Pankaj, and Vishnoi sir for combining their individual treats into 1 party for JEE-qualified students. For information on the pre-2000 AD days of coaching mandi, check this l...
1 971 – A Global History of the Creation of Bangladesh by Srinath Raghavan ⭐⭐⭐⭐✰ Worth Reading Srinath Raghavan’s 1971 reframes the creation of Bangladesh not simply as an inevitable regional conflict, but as a complex geopolitical event shaped by global trends, diplomatic isolation, and intense personal dynamics among world leaders. The book has a wide canvas, goes deep into history, and uses diplomatic records, political developments and military events to construct a coherent narrative. The author places the creation of Bangladesh within a wider global context, showing that regional wars are rarely shaped by regional actors alone. When history is so often viewed through a narrow national lens, this book compels the reader to examine 1971 from multiple and sometimes conflicting perspectives. What emerges is not merely a military history, but an illuminating account of diplomacy, power, national interest and human suffering. A Globalized Conflict Raghavan broadens t...
Within a radius of one kilometer, Kakadeo is the hub of the coaching mandi for JEE, MBA, Medical, etc having at least 20-30 coaching institutes. The classes are run by individuals teaching a single subject with a completely one-man show. Few people object to the name ' mandi ' but it's like a fish market only. Coaching Mandi is the perfect name for it because the teachers are earning the butter, not bread for them. When you go for admissions, people try to admit you to their institute with false advertisements and lucrative trial offers. It's altogether a mandi in which every teacher just wants students' admission, not in JEE, but in their institute. It was an urban legend that girls were used to seduce boys for admission in a few coaching centers. I and my friends tried in vain to find such lethal hunting beauties. My encounter with coaching mandi begins with JEE preparation. Nalanda Hotel, Pamela Restaurant, Agra sweet house were my favorite places there. For othe...
सृष्टी से पहले सत्य नहीं था, असत्य भी नहीं अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भीं नहीं था छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था सृष्टी का कौन हैं कर्ता कर्ता हैं यह वा अकर्ता ऊंचे आसमान में रहता सदा अध्यक्ष बना रहता वोहीं सच मुच में जानता. या नहीं भी जानता हैं किसी को नहीं पता नहीं पता नहीं है पता, नहीं है पता........... वोह था हिरान्य गर्भ सृष्टी से पहले विद्यमान वोही तो सारे भूत जात का स्वामी महान जो है अस्तित्वमाना धरती आसमान धारण कर ऐसे किस देवता कि उपासना करे हम अवि देकर जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर स्वर्ग ओर सूरज भी स्थिर ऐसे किस देवता कि उपासना करे हम अवि देकर गर्भ में अपने अग्नी धारण कर पैदा कर्व्यपा था जल इधर उधर नीचे ऊपर जगह चुके वो का एकमेव प्रान बंकर ऐसे किस देवता कि उपासना करे हम अवि देकर ॐ ! सृष्टी निर्माता स्वर्ग रचायता पूर्वज रख्सा कर सत्य धर्मं पलक अतुल जल नियामक रक्षा कर फैली हैं दिशाएं बहु जैसी उसकी सब में सब पर ऐसी ही देवता कि उपासना करे हम अवि देकर ऐसी ही देवता कि उपासना करे हम अवि देकर......
Life is chaotically complex series of events, so beautifully woven into a coherent whole. And I am writing most about worldly affairs, Today, I present an off beat weblog about me. Writing : First and most important, I like blogging. When I found the power to express what was in his heart, I found the love of a lifetime. A rare habit that is even continued today with full enthusiasm and pleasure. Also, there is dire need of educated persons who can not only perform better but also express better. Writing skills help one to present himself/herself before others, and also enables to think. Hence, I always encourage people to write and read. Blog : I speak and write a bit harsh and with irreverence in the blog. Anything and anyone is subjected to scrutiny and there should be no sacred cow in the society or nation. I uphold the fact that if an individual spends writing in praise of the authority because of the benefits this brings — as opposed to objective assessment — then t...
Comments