90 का दशक: हिंदी अख़बार, घर और छोटे शहरों की नागरिक स्मृति
1950 से 1990 का दौर भारत में बहुत मायनों में परिवर्तन का काल था। संविधान लागू हो चुका था और समानता, अधिकार, सामाजिक न्याय और आधुनिक नागरिकता की भाषा धीरे-धीरे जनता के बीच पहुँच रही थी। लेकिन यह भाषा सिर्फ़ संसद, अदालत या विश्वविद्यालयों से नहीं आई। छोटे शहरों और कस्बों में यह भाषा अख़बारों के जरिए घरों तक पहुँची। दैनिक जागरण, स्वतंत्र भारत, आज और बाद में राष्ट्रीय सहारा जैसे अख़बारों ने हिंदी पट्टी के पाठकों को सिर्फ़ खबर नहीं दी, बल्कि यह भी सिखाया कि नागरिक होना क्या होता है। सच कहें तो 90 के दशक में अखबार समाचार से कहीं ज्यादा था। वह घर, शहर, बाजार, करियर, मनोरंजन, धर्म, त्योहार, उम्मीदों और बदलते समय का दस्तावेज था। वह रोज सुबह दरवाजे पर नहीं आता था, बल्कि अपने साथ पूरा समाज लेकर आता था। सुबह का अख़बार: घर में दुनिया के आने की आवाज़ सुबह-सुबह दरवाजे पर अखबार गिरने की आवाज अपने-आप में एक अलार्म जैसी होती थी। अखबार वाला साइकिल से आता, मुड़ा हुआ अखबार फेंकता, और वह कभी दरवाजे के पास, कभी बरामदे में, कभी गमले के पास जाकर गिरता। अखबार अभी पूरा ताजा होता था, कागज की ठंडी तहें और ऊपर लगा ...