90 का दशक: हिंदी अख़बार, घर और छोटे शहरों की नागरिक स्मृति

1950 से 1990 का दौर भारत में बहुत मायनों में परिवर्तन का काल था। संविधान लागू हो चुका था और समानता, अधिकार, सामाजिक न्याय और आधुनिक नागरिकता की भाषा धीरे-धीरे जनता के बीच पहुँच रही थी। लेकिन यह भाषा सिर्फ़ संसद, अदालत या विश्वविद्यालयों से नहीं आई। छोटे शहरों और कस्बों में यह भाषा अख़बारों के जरिए घरों तक पहुँची। दैनिक जागरण, स्वतंत्र भारत, आज और बाद में राष्ट्रीय सहारा जैसे अख़बारों ने हिंदी पट्टी के पाठकों को सिर्फ़ खबर नहीं दी, बल्कि यह भी सिखाया कि नागरिक होना क्या होता है।

सच कहें तो 90 के दशक में अखबार समाचार से कहीं ज्यादा था। वह घर, शहर, बाजार, करियर, मनोरंजन, धर्म, त्योहार, उम्मीदों और बदलते समय का दस्तावेज था। वह रोज सुबह दरवाजे पर नहीं आता था, बल्कि अपने साथ पूरा समाज लेकर आता था।

सुबह का अख़बार: घर में दुनिया के आने की आवाज़

सुबह-सुबह दरवाजे पर अखबार गिरने की आवाज अपने-आप में एक अलार्म जैसी होती थी। अखबार वाला साइकिल से आता, मुड़ा हुआ अखबार फेंकता, और वह कभी दरवाजे के पास, कभी बरामदे में, कभी गमले के पास जाकर गिरता। अखबार अभी पूरा ताजा होता था, कागज की ठंडी तहें और ऊपर लगा हुआ मोड़ जैसे बता रहे होते थे कि दुनिया अभी-अभी हमारे घर पहुँची है।

लेकिन अखबार खुलने का पहला हक अक्सर पिताजी का होता था। चाय आई नहीं कि अखबार उनके हाथ में होना चाहिए। घर में कोई और पहले खोल ले, तो हल्की-सी नाराजगी हो सकती थी। 

पिताजी के बाद अखबार एकदम सबको पूरा नहीं मिलता था। वह जैसे घर में छन-छनकर आगे बढ़ता था। पहले मुख्य पन्ना अलग, फिर शहर वाला पन्ना अलग, फिर खेल पन्ना किसी बच्चे के हाथ में, फिर फिल्मी या रंगीन पन्ना किसी और के पास।

दैनिक जागरण: उत्तर भारत के घरों की सुबह की सार्वजनिक खिड़की

90 के दशक में दैनिक जागरण जैसे अख़बार उत्तर भारत के घरों में सुबह की पहली सार्वजनिक खिड़की थे। दैनिक जागरण का कानपुर और आसपास के पाठकों के लिए भावनात्मक रिश्ता बहुत पुराना था। बाद के वर्षों में गोरखपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ, मेरठ, आगरा, बरेली और दिल्ली संस्करणों के विस्तार ने इसे हिंदी पट्टी का बड़ा स्थानीय अख़बार बना दिया।

1991-94 के बीच सलेमपुर में जो दैनिक जागरण आता था, वह शायद गोरखपुर संस्करण था, जिसमें देवरिया और सलेमपुर की स्थानीय खबरें अलग पन्नों या स्थानीय कॉलमों में आती थीं। बाद में कानपुर आने के बाद, 1994 के बाद मैंने दैनिक जागरण का कानपुर संस्करण पढ़ना शुरू किया।

अख़बार केवल घर में ही नहीं पढ़ा जाता था। नाई की दुकान, चाय की गुमटी, डॉक्टर के क्लिनिक और साइकिल मरम्मत की दुकानों पर भी वही अख़बार टाइम-पास का सबसे भरोसेमंद साधन था। नाई की दुकान में अपनी बारी आने तक आदमी कुर्सी के पास पड़ी पुरानी प्रति उठा लेता था। कहीं बाल कट रहे होते, कहीं रेडियो बज रहा होता, कहीं शीशे के सामने बैठे लोग राजनीति पर बहस कर रहे होते |

संपादकीय पन्ना: नागरिकता, विचार और तर्क की पाठशाला

उस समय “विश्वगुरु” बनने की बात किताबों या भाषणों में जितनी नहीं थी, उतनी शायद पढ़ाई, भाषा, अनुशासन और जागरूकता के जरिए थी। संपादकीय पृष्ठ इस पढ़ाई का सबसे गंभीर हिस्सा था। घर के बच्चे पहले खेल पन्ना, सिनेमा विज्ञापन या बच्चों का सेक्शन देखते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी नजर संपादकीय पन्ने पर भी टिकने लगती थी। वहाँ देश, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, न्यायपालिका, विदेश नीति, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और लोकतंत्र जैसे विषय आते थे।

संपादकीय पन्ना शायद बचपन में थोड़ा कठिन लगता था, लेकिन घर के बड़े लोग उसे गंभीरता से पढ़ते थे। दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ की अपनी अलग पहचान थी। नरेंद्र मोहन जैसे संपादकीय नेतृत्व ने अख़बार को राष्ट्रवादी, स्पष्ट और निर्भीक स्वर दिया। भरत झुनझुनवाला जैसे लेखक आर्थिक विषयों पर लिखते थे और उदारीकरण के बाद बदलती भारतीय अर्थव्यवस्था को हिंदी पाठकों की भाषा में समझाने की कोशिश करते थे। उसी दौर में अरुण शौरी जैसे लेखकों के लेख भी पाठकों को सत्ता, प्रशासन और जवाबदेही पर सोचने के लिए प्रेरित करते थे। खुशवंत सिंह का प्रसिद्ध कॉलम भी उस दौर की पाठकीय संस्कृति का हिस्सा था। अंग्रेज़ी में उनका कॉलम “विद मैलिस टुवर्ड्स वन एंड ऑल” नाम से जाना जाता था, जिसे हिंदी पाठक अक्सर कबीर की पंक्ति “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर” के भाव में याद करते हैं।  

पूर्व CBI निदेशक जोगिंदर सिंह के “मैनेजमेंट सूत्र” जैसे लेख इसी तरह याद रह जाते हैं। उनमें सरकारी सेवा, अनुशासन, निर्णय क्षमता, ईमानदारी, समय-प्रबंधन और सफलता की छोटी-छोटी सीखें होती थीं। दीनानाथ मिश्र जैसे लेखक राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति और संघ-समर्थक वैचारिक स्वर के कारण पहचाने जाते थे, जबकि वेद प्रताप वैदिक विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय मामलों और समसामयिक राजनीति पर अपने बेबाक लेखन के लिए जाने जाते थे। कुलदीप नैयर का “बिटवीन द लाइंस” जैसा कॉलम भी हिंदी पाठकों के लिए यादगार था; ऐसे नाम अख़बार के विचार पन्ने को सिर्फ खबरों से आगे, बहस और वैचारिक पहचान की जगह बना देते थे। इन नामों को पढ़ते हुए पाठक सिर्फ़ खबर नहीं पढ़ता था, वह तर्क, असहमति और विचार की भाषा सीखता था। 

इसी तरह व्यंग्य और हल्के-फुल्के विचार की भी अपनी दुनिया थी। आलोक पुराणिक जैसे लेखकों ने बाद के वर्षों में व्यंग्यात्मक लेखन को हिंदी पाठकों तक लोकप्रिय अंदाज़ में पहुँचाया। उनकी शैली में बाजार, राजनीति, उपभोक्तावाद और रोज़मर्रा की विडंबनाओं पर चुटकी होती थी। “प्रपंचतंत्र” जैसे स्तंभों की स्मृति इसी कारण रहती है, क्योंकि वे गंभीर बात को भारी भाषा में नहीं, बल्कि मुस्कराहट और तंज के साथ कहते थे।

ऐसे लेख उस दौर के पाठकों के लिए खास होते थे, क्योंकि वे प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी नौकरी, प्रशासनिक सेवा और सफल जीवन की कल्पना से जुड़े होते थे। अख़बार सुबह-सुबह घर में सिर्फ़ राजनीतिक चेतना नहीं लाता था, वह यह भी बताता था कि समय कैसे सँभालना है, पढ़ाई कैसे करनी है और व्यवस्था को समझना कैसे है।

हिंदी दैनिकों की पुरानी परंपरा

आज’ जैसे पुराने हिंदी दैनिक की परंपरा भी लंबे समय से वाराणसी, कानपुर, गोरखपुर, पटना और इलाहाबाद जैसे केंद्रों से जुड़ी रही। ऐसे अख़बार सिर्फ़ समाचार के माध्यम नहीं थे, बल्कि हिंदी भाषा, स्वतंत्रता-चेतना और क्षेत्रीय सार्वजनिक जीवन के वाहक भी थे। इनके जरिए शहरों और कस्बों में पाठकों को यह एहसास होता था कि वे किसी बड़े सामाजिक और राष्ट्रीय संवाद का हिस्सा हैं।

'स्वतंत्र भारत' का रंग इससे थोड़ा अलग था। लखनऊ से प्रकाशित यह अख़बार १५ अगस्त १९४७ को शुरू हुआ था और स्वतंत्र भारत के जन्म के साथ उसकी प्रतीकात्मक शुरुआत हुई। स्वतंत्र भारत में साहित्य, संस्कृति और बच्चों की सामग्री की अपनी पहचान थी।  मेरी स्मृति में नरेन्द्र कोहली की ‘अभ्युदय’ जैसी रामकथा और ‘महासमर’ जैसी महाभारत-कथा भी इसी अख़बारी पाठ-संस्कृति का हिस्सा थीं। मेरे लिए 'बेताल पच्चीसी' और 'राजा भोज की बत्तीस पुतलियों' की कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं थीं। हर कथा के अंत में कोई न कोई प्रश्न बच जाता था कि सही क्या है, न्याय किसे कहते हैं और वचन निभाने की कीमत क्या होती है।

स्वतंत्र भारत में छपने वाली धारावाहिक सामग्री का इंतज़ार अलग ही होता था। जैसे आज लोग किसी वेब सीरीज़ का अगला एपिसोड देखते हैं, वैसे हम अख़बार में अगले दिन का अंश खोजते थे।

'राष्ट्रीय सहारा' अपेक्षाकृत नया था और इसका प्रकाशन 1992 को लखनऊ से शुरू हुआ। राष्ट्रीय सहारा के साथ आने वाले परिशिष्टों में साहित्य, विचार, राजनीति, फिल्म, करियर, महिलाओं के मुद्दे, युवा जीवन और कहानियाँ सब कुछ मिलता था। कभी हस्तक्षेप जैसे गंभीर लेखों वाला पन्ना, कभी मूवी मसाला, कभी आधी दुनिया जैसा घरेलू-सामाजिक संसार, और कभी करियर की जानकारी। अखबार घर में आता था, लेकिन उसका असर पत्रिका जैसा होता था।

शहर पन्ना और पेज ३: छोटे शहर का कच्चा सच

90 के दशक के शहर पन्ने बनाने वाले उप-संपादक, जिला संवाददाता, फोटो पत्रकार और स्ट्रिंगर असल में आपके बचपन के शहर-लेखक थे। हिंदी अखबारों का लोकल पन्ना उस दौर में शहर का सबसे सच्चा आईना लगता था। उसमें चमक-दमक कम और मोहल्लों की बेचैनी ज्यादा होती थी। कहीं चोरी की खबर, कहीं चेन छिनैती, कहीं दहेज के कारण बहू को जलाए जाने की दर्दनाक खबर, कहीं बस अड्डे पर जेबकटी, कहीं रात में दुकान का ताला टूटा, स्कूल का वार्षिकोत्सव, कहीं किसी कॉलोनी में मारपीट,  बाजार की समस्या, नाली और जलभराव, कहीं स्कूल जाते बच्चे से साइकिल छीन ली गई। 

हमारे समय का पेज 3 अंग्रेज़ी अखबारों वाला चमकदार पेज 3 नहीं था।  यह पन्ना इसलिए खास था क्योंकि उसमें दुनिया आपके घर के बाहर से शुरू होती थी। दिल्ली या लखनऊ की राजनीति दूर लग सकती थी, लेकिन “फलाँ चौराहे पर जाम”, “फलाँ स्कूल में कार्यक्रम”, “फलाँ मोहल्ले में चोरी”, “बिजली आपूर्ति बाधित” पढ़ते ही पाठक अपने शहर का नागरिक बन जाता था। यही वह जगह थी जहाँ छोटे शहर का बच्चा पहली बार समझता था कि उसका मोहल्ला भी खबर बन सकता है।अख़बार ने पहली बार बताया कि हमारा शहर भी इतिहास के बाहर नहीं है।

लेकिन ज़िलों की पत्रकारिता अक्सर 'घटना-केंद्रित' थी, 'मुद्दा-केंद्रित' नहीं। पुल टूटने की खबर छपती थी, लेकिन वह क्यों टूटा और दोबारा न टूटे इसके लिए जवाबदेही तय कराने वाली रिपोर्टिंग विरल थी। लखनऊ की राजनीति अख़बारों पर हावी रहती थी; पूर्वांचल, बुंदेलखंड और तराई की अनेक समस्याएँ केवल किसी बड़ी त्रासदी के बाद ही सुर्खियाँ बनती थीं।

सिनेमा हॉल, शो टाइम और फिल्मी पन्नों की दुनिया

अख़बारों में एक पूरा हिस्सा या कई बार लगभग पूरा पन्ना सिनेमा हॉल और शो टाइम के विज्ञापनों से भरा होता था। उसमें शहर के सिनेमाघरों के नाम, फिल्म का नाम, पोस्टरनुमा डिज़ाइन, “भव्य शुभारंभ”, “हाउसफुल”, “आज से”, “मैटिनी”, “ईवनिंग”, “नाइट शो”, “बालकनी”, “ड्रेस सर्किल” जैसी भाषा होती थी।

90 के दशक के अंत और २००० के शुरुआती वर्षों में हिंदी अखबारों ने हमारे लिए हॉलीवुड की एक नई खिड़की खोली थी। मेरे पास आज भी “द क्राफ्ट” और “सेविंग प्राइवेट रायन” जैसी अंग्रेज़ी फिल्मों के हिंदी अखबारों में छपे समीक्षात्मक लेखों की कटिंगें याद हैं, जिन्हें मैंने कभी अपनी दीवार पर चिपकाया था। दैनिक जागरण जैसे अखबार “लॉर्ड ऑफ द रिंग्स” पर दो-दो पन्नों के रंगीन विशेषांक निकालते थे, जिनमें टोल्किन की दुनिया को एक तरह की पौराणिक कथा की तरह समझाया जाता था। अंगूठी, अंधकार की शक्ति, जादूगर, योद्धा, बौने और अंतिम युद्ध जैसी चीजें हिंदी पाठक को अपने पौराणिक कल्पना-लोक से जोड़कर समझाई जाती थीं।

उस समय यह बहुत बड़ी बात थी, क्योंकि इंटरनेट आम घरों तक नहीं पहुँचा था और अंग्रेज़ी फिल्मों की जानकारी छोटे शहरों तक मुख्य रूप से अखबारों, केबल टीवी और वीडियो लाइब्रेरी के सहारे ही आती थी। उस समय हिंदी अखबारों में हॉलीवुड फिल्मों की समीक्षा छपना कोई छोटी बात नहीं थी। यह वह दौर था जब सैटेलाइट टीवी, केबल नेटवर्क, स्टार मूवीज़, एचबीओ, ज़ी एमजीएम, एएक्सएन, वीडियो कैसेट लाइब्रेरी और बाद में वीसीडी/डीवीडी संस्कृति धीरे-धीरे छोटे शहरों तक पहुँच रही थी। अखबारों को यह समझ आने लगा था कि हिंदी पाठक सिर्फ अमिताभ, शाहरुख, सलमान, माधुरी या गोविंदा के बारे में ही नहीं पढ़ना चाहता, बल्कि वह हॉलीवुड सिनेमा की दुनिया के बारे में भी जानना चाहता है।

खेल पन्ना: स्कोरकार्ड से बनती मैच की कहानी

खेल पन्ना बच्चों और किशोरों का सबसे प्रिय हिस्सा होता था। क्रिकेट तो था ही, लेकिन उसके साथ हॉकी, एथलेटिक्स, टेनिस, फुटबॉल, स्थानीय टूर्नामेंट, स्कूल मैच, जिला स्तरीय प्रतियोगिताएँ और खिलाड़ियों की छोटी खबरें भी आती थीं। इस पन्ने का असर यह था कि बच्चा खेल को दूरदर्शन के सीमित प्रसारण से आगे पढ़ता था। मैच अगर टीवी पर न देखा हो, तो अख़बार में स्कोरकार्ड पढ़कर भी मैच की कहानी बन जाती थी।

बच्चों का सेक्शन: अपना पन्ना, अपना नाम

अख़बारों में बच्चों का सेक्शन बच्चों के लिए “अपना पन्ना” जैसा होता था। उसमें पहेलियाँ, सामान्य ज्ञान, छोटी कहानियाँ, कार्टून, चुटकुले, विज्ञान-रोचक तथ्य, कविता और कभी-कभी बच्चों की भेजी हुई रचनाएँ छपती थीं। यह वह समय था जब बच्चों के पास इंटरनेट नहीं था, और अख़बार में अपना नाम छप जाना बहुत बड़ी उपलब्धि होती थी।

दैनिक जागरण के बच्चों और हल्के-फुल्के पन्नों में विदेशी कॉमिक स्ट्रिप्स भी दिख जाती थीं। मेरी स्मृति में हेनरी बाय डॉन ट्रैक्टे भी आती थी। हेनरी एक गंजा, लगभग मौन बच्चा था, जिसकी छोटी-छोटी हरकतों में बिना भाषा के हास्य छिपा रहता था। वह कुछ बोलता नहीं था।


करियर, सरकारी नौकरी और भविष्य की खिड़की

सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए अखबार बहुत जरूरी हुआ करता था। उसमें संघ लोक सेवा आयोग, प्रांतीय सिविल सेवा, बैंक, रेलवे, कर्मचारी चयन आयोग, शिक्षक भर्ती, सेना भर्ती, पुलिस भर्ती, आईटीआई, पॉलिटेक्निक, विश्वविद्यालय प्रवेश, प्रवेश परीक्षा फॉर्म, परिणाम, कटऑफ और साक्षात्कार से जुड़ी सलाह जैसी जानकारी मिलती थी। छोटे शहरों और कस्बों में अखबार ही युवाओं के लिए करियर और भविष्य की सबसे भरोसेमंद खिड़की था।

विज्ञापन और वर्गीकृत विज्ञापन: छोटे अक्षरों में छिपा पूरा समाज

90 के दशक के अखबारों में विज्ञापन भी बड़े मन से पढ़े जाते थे। साइकिल, रेडियो, टीवी, टेप रिकॉर्डर, पंखा, कूलर, स्कूल प्रवेश, कोचिंग, साड़ी सेल, सरकारी योजना,  दुकान का उद्घाटन, राशन दुकान, ट्रैक्टर, बीज, खाद, लॉटरी और बीमा तक के विज्ञापन अपने समय की सामाजिक आकांक्षाएँ बताते थे। कई बार पूरा एक पन्ना विज्ञापन का होता था, लेकिन बच्चे भी उसे देखते थे, क्योंकि वही बाजार की खिड़की था।

अखबार का वर्गीकृत विज्ञापन वाला हिस्सा भी बहुत ताकतवर होता था। उसमें नौकरी, ट्यूशन, कोचिंग, मकान किराए पर, दुकान, जमीन, वाहन, खोया-पाया, नाम परिवर्तन, कानूनी सूचना, वैवाहिक विज्ञापन, निविदा, स्कूल में प्रवेश, कोचिंग बैच, टाइपिंग और शॉर्टहैंड कक्षाओं तक की जानकारी मिल जाती थी। कई लोगों के लिए अखबार का यही छोटा-छोटा अक्षरों वाला हिस्सा सबसे काम का पन्ना होता था।

नब्बे के दशक के हिंदी अखबारों में एक खास किस्म के छोटे-छोटे विज्ञापन दिखते थे। कोने में छपी किसी विदेशी लड़की की धुंधली-सी फोटो, ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा होता था: “ओ दोस्ती करें!” या “क्या आप अकेले हैं?” फिर नीचे दावा: “विदेशी लड़कियों से दोस्ती करें”, “नई मित्रता सेवा”, “अभी कॉल करें”।

कई बार फोटो ऐसी होती थी जो असली भी हो सकती थी, स्टॉक इमेज भी, या किसी पुराने विदेशी पत्रिका से उठाई गई तस्वीर भी। उस दौर के अखबारों में ये विज्ञापन अक्सर ज्योतिष, तांत्रिक उपाय, नौकरी दिलाने के दावे, वजन घटाने की दवा, गुप्त रोग, पत्र-मित्रता, पेन फ्रेंड क्लब और टेलीकॉलर सेवाओं के साथ छपते थे। एक तरफ उदारीकरण के बाद विदेशी चीजों का आकर्षण था, दूसरी तरफ छोटे शहरों का अकेलापन और जिज्ञासा। अखबार सिर्फ खबर नहीं देते थे, वे इच्छाओं, भ्रमों, उम्मीदों और बाजारू चालाकियों का भी मंच बन चुके थे।

लॉटरी और वैवाहिक कॉलम: अख़बार का छोटा-सा सपना बाज़ार

हिंदी अख़बारों के आख़िरी पन्नों या अंदरूनी पन्नों में एक अलग दुनिया बसी रहती थी। कहीं राज्य लॉटरी, सिक्किम लॉटरी, नागालैंड लॉटरी, बंपर ड्रॉ, नवरात्रि बंपर, दीवाली बंपर जैसे विज्ञापन छपे रहते थे, तो कहीं छोटे-छोटे बॉक्स में लिखा होता था कि “पहला इनाम 25 लाख, दूसरा इनाम कार, तीसरा इनाम स्कूटर”। इन विज्ञापनों की भाषा भी बड़ी दिलचस्प होती थी। मोटे अक्षरों में “आज ही टिकट लें”, “सीमित टिकट”, “सरकारी मान्यता प्राप्त योजना”, “लाखों जीतने का सुनहरा अवसर” जैसे वाक्य छपे मिलते थे। उस दौर में लॉटरी केवल जुआ या किस्मत का खेल नहीं लगती थी, बल्कि मध्यमवर्गीय उम्मीदों की एक सस्ती टिकट थी। दस रुपये की पर्ची में कोई अपना मकान, दुकान, स्कूटर, बेटी की शादी या कर्ज उतर जाने का सपना देख लेता था।

अख़बारों के वैवाहिक विज्ञापन उस समय के समाज का सबसे साफ आईना थे। वे छोटे जरूर होते थे, लेकिन उनमें पूरा सामाजिक ढांचा छिपा रहता था: जाति, गोत्र, रंग-रूप, नौकरी, वेतन, परिवार, शिक्षा, दहेज की अप्रत्यक्ष उम्मीद, और “सुसंस्कृत परिवार” जैसी भाषा। ऐसे विज्ञापनों में जाति का उल्लेख बहुत सीधा होता था। जैसे: कायस्थ वर वांछित: सुशिक्षित, सुंदर, गृहकार्य में दक्ष कन्या, आयु 24 वर्ष, एम.ए., ऊँचाई 5’3”, प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार से। सरकारी/बैंक सेवा में कार्यरत वर वांछित। संपर्क करें: बॉक्स नं...

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वैवाहिक विज्ञापन में आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चलती थी। लड़की बी.ए. या एम.एससी. हो सकती थी, लेकिन साथ में “घरेलू कार्यों में दक्ष” भी लिखा जाता था। लड़का इंजीनियर या सरकारी अफसर हो सकता था, लेकिन “अपनी जाति/समाज में वर वांछित” भी जरूरी शर्त रहती थी। यानी शिक्षा आधुनिक थी, नौकरी आधुनिक थी, अख़बार आधुनिक माध्यम था, लेकिन सामाजिक चयन की कसौटी बहुत पुरानी थी। लेकिन आज उन्हें पढ़ने पर समझ आता है कि अख़बार केवल खबर नहीं छापता था, वह अपने समय की सामाजिक मानसिकता भी रोज़ दर्ज करता था।

टीवी गाइड, घर-गृहस्थी और त्योहारों का अख़बार

1990s में अखबारों का रविवार का रंगीन परिशिष्ट अपने आप में एक अलग दुनिया हुआ करता था। सप्ताह के बाकी दिनों के गंभीर समाचारों के बीच रविवार को अखबार कुछ ज्यादा आराम से पढ़ने लायक बन जाता था। इन रंगीन पन्नों की एक खास बात यह भी थी कि उनमें अखबार और पत्रिका के बीच का अनुभव मिलता था—बड़े-बड़े शीर्षक, रंगीन तस्वीरें, आकर्षक चित्र और लंबे लेख। रविवार को अखबार पढ़ना सिर्फ खबरें जानना नहीं, बल्कि कुछ घंटे आराम से बैठकर पढ़ने की एक घरेलू रस्म हुआ करता था।

टीवी पर क्या आने वाला है, यह भी अखबार से ही पता चलता था। घर में लोग अखबार देखकर तय करते थे कि रात को कौन-सा धारावाहिक देखना है, रविवार को कौन-सी फिल्म आएगी, क्रिकेट मैच कब है और बच्चों का कार्यक्रम किस समय आता है। उस दौर में अखबार घर का छोटा-सा टीवी गाइड भी था।

अखबारों में पाक विधि, बुनाई, कढ़ाई, गृह-सज्जा, सौंदर्य सुझाव, स्वास्थ्य सलाह, बच्चों की परवरिश, रिश्तों पर लेख, यात्रा, त्योहार की तैयारी, व्रत-कथा और विशेषांक जैसी सामग्री भी आती थी। यह हिस्सा घर की माताओं-बहनों के लिए उपयोगी भी होता था और मनोरंजक भी। इसमें घर-गृहस्थी, स्वाद, सजावट, परंपरा और बदलते समय की छोटी-छोटी झलकियाँ साथ-साथ मिलती थीं।

अखबारों में आज का पंचांग, राशिफल, व्रत-त्योहार, कथा, मंदिर समाचार, प्रवचन, ज्योतिष, मुहूर्त और नवरात्रि, दीवाली, होली जैसे त्योहारों पर विशेष सामग्री भी आती थी। त्योहारों के समय तो पूरा अखबार बदल जाता था। रंगीन विज्ञापन, शुभकामना संदेश, विशेष लेख, पूजा-विधि और बाजार की रौनक से अखबार अपने-आप में त्योहार जैसा लगने लगता था।

कैलेंडर: अख़बार के साथ आने वाला घर का प्लानिंग बोर्ड

नए साल के आसपास हिंदी अखबारों के साथ एक बड़ा-सा रंगीन कैलेंडर आया करता था। कभी वह दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स या किसी स्थानीय अखबार का होता था। कई बार अखबार वाला उसे अलग से मोड़कर देता था, और घर में आते ही उसकी अहमियत अखबार से भी ज्यादा हो जाती थी।

वह कैलेंडर सिर्फ तारीख देखने के लिए नहीं था। वही घर का प्लानिंग बोर्ड था। पापा वेतन की तारीख देखते थे, मम्मी व्रत-त्योहार देखती थीं, बच्चे छुट्टियाँ गिनते थे। किसी रिश्तेदार की शादी, परीक्षा, बिजली का बिल, गैस बुकिंग, स्कूल की फीस, सब उसी कैलेंडर पर पेन से घेरा बनाकर लिख दिया जाता था।

संपादक के नाम पत्र: ट्विटर से पहले का सार्वजनिक मंच

“संपादक के नाम पत्र” एक तरह का सार्वजनिक मंच था। लोग सड़क, बिजली, पानी, भ्रष्टाचार, स्कूलों की समस्याओं, रेलवे, राशन, अस्पताल और स्थानीय प्रशासन से जुड़ी शिकायतों पर पत्र लिखते थे। यह आज के ट्विटर, एक्स या फेसबुक पोस्ट जैसा था, बस अधिक संयमित और प्रतिष्ठित रूप में। अखबार में पत्र छप जाना अपने-आप में बड़ी बात मानी जाती थी।

मंडल, मंदिर और मायावती–मुलायम की राजनीति के बीच किसान, मज़दूर, बुनकर, छोटे कस्बों का उद्योग और नगर निकाय जैसे मुद्दे अक्सर हाशिए पर चले जाते थे।

आख़िर में: अख़बार एक वस्तु नहीं, पूरा सामाजिक अनुभव था

हिंदी अखबारों ने छोटे शहरों और कस्बों में आधुनिक भारत को रोज़-रोज़ पढ़ने लायक बनाया। उन्होंने नागरिकता सिखाई, भाषा दी, तर्क दिया, शहर का आईना दिया, बच्चों को अपना पन्ना दिया, युवाओं को नौकरी की राह दिखाई, घरों को कैलेंडर दिया, त्योहारों को रंग दिया और पाठकों को यह भरोसा दिया कि उनकी दुनिया भी खबर बनने लायक है।

दैनिक जागरण, स्वतंत्र भारत, आज, राष्ट्रीय सहारा और ऐसे अनेक अखबार सिर्फ़ छपे हुए कागज़ नहीं थे। वे घर में आने वाली सुबह, पिता की चाय, बच्चों की जिज्ञासा, माँ की व्रत-तिथि, शहर की बेचैनी, नौकरी की तैयारी, फिल्मी सपने, खेल का स्कोरकार्ड, और बदलते भारत की रोज़ की डायरी थे।

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