बचपन में टेलीविज़न पर देखी गई कुछ कहानियाँ पूरी तरह याद नहीं रहतीं। उनका कोई चेहरा, कोई धुन, कोई संवाद या पर्दे पर काँपती हुई रोशनी भर हमारे भीतर रह जाती है। वर्षों बाद हम उन्हें खोजने निकलते हैं, तो पता चलता है कि कार्यक्रम से अधिक हम उस समय को खोज रहे थे, जिसमें हमने उसे पहली बार देखा था। शायद पुराने कार्यक्रमों की खोज वास्तव में अपने ही बीते हुए रूप की खोज होती है। इस पर पहले भी लिख चुका हूँ: 90s नॉस्टैल्जिया: एंटीना, केबल और एक पूरा बचपन और Search for Lost Stories of Childhood . वे चेहरे, वे भ्रम और दूरदर्शन कभी-कभी कोई पुराना नाम स्मृतियों की पूरी शृंखला खोल देता है। बचपन में दूरदर्शन पर मैंने पहली बार मराठी फ़िल्म ‘ माझा छकुला ’ देखी थी। तब मैं शायद आठ-नौ साल का रहा होऊँगा। भाषा पूरी तरह समझ में नहीं आ रही थी, फिर भी कहानी, भावनाएँ और बच्चे की मासूमियत सीधे दिल में उतर गई थीं। बरसों तक यह फ़िल्म केवल धुँधली स्मृतियों में बसी रही। कुछ बरस बाद बाद में जब मैंने ‘ मासूम’ देखी, तो कहानी के भीतर कोई पुरानी पहचान-सी जागी। लगा, ऐसी ही भावनात्मक दुनिया से मैं कभी...
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