रामलीला: एक कथा, अनेक रंग
प्रसिद्ध अर्जेंटीनी साहित्यकार होर्खे लुई बोर्खेस का मानना था कि मानव सभ्यता मूलतः चार कथाएँ बार-बार सुनाती आई है: नगर की घेराबंदी, घर वापसी, किसी लक्ष्य की खोज और त्याग या बलिदान। रामायण में ये चारों शाश्वत कथाएँ एक साथ मिलती हैं। लंका की घेराबंदी, चौदह वर्षों बाद अयोध्या वापसी, सीता की खोज और पिता के वचन के लिए राम का राजसिंहासन त्यागना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। शायद इसी कारण रामकथा कभी पुरानी नहीं पड़ती। कथा का आरंभ, संघर्ष और अंत सबको पहले से मालूम होता है, फिर भी रामलीला शुरू होते ही दर्शकों के भीतर वही भक्ति-भाव, वही उत्सुकता और वही भाव-विभोरता जाग उठती है।
रामलीला ने इस परिचित कथा को ग्रंथों से निकालकर जनजीवन के बीच प्रत्यक्ष कर दिया। मैदान अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट और लंका बन जाते; गाँव और मुहल्ले के लोग राम, लक्ष्मण, हनुमान और रावण का रूप धारण करते; कारीगर बाँस, कपड़े और रंगीन कागज से महल, मुकुट और विशाल पुतले रचते। दर्शक जानते थे कि आगे क्या होने वाला है, फिर भी वनवास पर आँखें नम होतीं, भरत-मिलाप पर हृदय भर आता और रावण-दहन की प्रतीक्षा में वही बालसुलभ रोमांच लौट आता। इसलिए बीते समय की रामलीला केवल धार्मिक नाटक नहीं, बल्कि पहले से ज्ञात कथा को हर वर्ष नई श्रद्धा से जीने का सामूहिक अनुष्ठान थी। दर्शक केवल कथा देखते नहीं थे, बल्कि कई दिनों तक उसके भीतर जीते थे। इसलिए बीते समय की रामलीला मात्र एक धार्मिक नाटक नहीं, बल्कि कथा, मेला, लोक-रंगमंच, कारीगरी, सामुदायिक श्रम और सामूहिक स्मृति का जीवंत उत्सव थी।
रामलीला को केवल “नाटक” कहना इसलिए अधूरा है। यह कथा, मेला, बाजार, कारीगरी, संगीत, सामुदायिक श्रम और बचपन की कल्पना का मिला-जुला संसार थी। प्रेमचंद के संस्मरणात्मक आख्यान में बच्चा रामलीला के पात्रों का श्रृंगार देखने दोपहर से बैठ जाता है, रंगों के लिए पानी लाता है, रामरज पीसता है और पंखा झलता है। उसके लिए राम के विमान के पीछे बैठने का गर्व बड़े होकर राजकीय सम्मान पाने से भी अधिक तीखा था। यही उस बीते युग की रामलीला का भावनात्मक केंद्र था: दर्शक और आयोजनकर्ता के बीच कोई कठोर दीवार नहीं थी।
1. एक कथा, अनेक स्थानीय रंग
पुराने उत्तर भारत में दशहरा केवल कैलेंडर का त्योहार नहीं था। वह साल के उन कुछ दिनों में से था, जब पूरा गाँव, कस्बा या मुहल्ला अपनी रोजमर्रा की सीमाओं से बाहर निकलकर एक सामूहिक कल्पना-लोक में प्रवेश करता था। मैदान अयोध्या बन जाता, पोखरा क्षीरसागर, बाग जनकपुर, कोई ऊँचा चबूतरा लंका और मुहल्ले की सड़क राम-बारात का मार्ग।
उत्तर भारत में रामलीला की सबसे दिलचस्प विशेषता यह है कि रामकथा का मूल ढाँचा लगभग वही रहता है, लेकिन उसका मंचन स्थानीय समाज के अनुसार बदल जाता है। राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण वही हैं; रामचरितमानस की चौपाइयाँ भी आधार बनी रहती हैं, लेकिन भाषा, संगीत, मंच, अभिनय और दर्शकों की भागीदारी अलग हो सकती है। UNESCO की सूची में भी अयोध्या, रामनगर/वाराणसी, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी जैसी अलग-अलग रामलीला परंपराओं को उल्लेखनीय माना गया है।
कुमाऊँ की रामलीला में स्थानीय संस्कृति का प्रभाव और स्पष्ट दिखाई देता है। अल्मोड़ा की परंपरा में हिंदी के साथ कुमाऊँनी बोली का प्रयोग हुआ; कुछ प्रसंग पूरी तरह कुमाऊँनी में प्रस्तुत किए जाते हैं। यहाँ अभिनय के साथ संगीत और गायन की विशेष भूमिका है तथा स्थानीय संगीत-परंपराओं और लोक-नाट्य शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है। यानी कल्पना कीजिए: अयोध्या की रामलीला में तीर्थ और धार्मिक स्मृति का वातावरण, रामनगर में पूरा शहर ही रामायण का दृश्य-क्षेत्र और कुमाऊँ में वही कथा पहाड़ी भाषा, संगीत और स्थानीय रंग के साथ सामने आती है।
रामलीला में कलाकारों को हर बार कोई बिल्कुल नई कहानी नहीं बनानी होती। कहानी पहले से सबको मालूम है। लेकिन उस निश्चित कथा के भीतर अभिनय, आवाज, संगीत, स्थानीय भाषा, दर्शकों की प्रतिक्रिया और वातावरण हर प्रदर्शन को थोड़ा अलग बना सकते हैं। इसलिए रामलीला को केवल “रामायण का नाटक” कहना अधूरा होगा। यह ज्यादा सही मायने में एक जीवित प्रदर्शन-परंपरा है, जिसमें कथा स्थिर रहती है, लेकिन उसका अनुभव हर जगह और हर वर्ष फिर से पैदा होता है। संगीत नाटक अकादमी भी रामलीला को गीत, कथन, पाठ और संवाद के मेल वाली प्रदर्शन-परंपरा बताती है, जिसमें दर्शक भी कथानक और गायन में भाग लेते हैं।
और शायद यही कारण है कि दर्शक को कहानी पता होने के बावजूद रामलीला देखने की जरूरत महसूस होती है। वह यह जानने नहीं जाता कि राम के साथ क्या होगा; वह देखने जाता है कि इस बार उसके अपने शहर, अपने कलाकार और अपने समुदाय के हाथों रामकथा कैसी जीवित होती है।
2. गाँव और शहर: दो अलग रामलीलाएँ, एक ही सामूहिकता
गाँव की रामलीला
गाँव में रामलीला प्रायः “हमारे अपने लोगों” की लीला होती थी। अभिनेता किसान, दुकानदार, शिक्षक या गाँव के लड़के होते; पोशाकें समिति के संदूक में वर्ष भर बंद रहतीं; मंच बाँस, बल्लियों और कपड़े से बनता; पर्दे के पीछे लालटेन, पेट्रोमैक्स और मेकअप की छोटी-सी व्यवस्था होती। आसपास के गाँवों के लोग रामलीला देखने जुटते थे, गाँव के लोग स्वयं पात्र बनते थे और रामलीला समिति लगभग एक महीने पहले से तैयारी शुरू करती थी। दशहरे के दिन मेला लगता और धनुष-यज्ञ, लक्ष्मण-परशुराम संवाद, राम-सीता विवाह, राम वनवास तथा लंका-दहन जैसे प्रसंग विशेष आकर्षण होते थे।
गाँव की लीला में तकनीकी पूर्णता कम हो सकती थी, लेकिन उसका आकर्षण पहचान का था। दर्शक जानता था कि मंच पर हनुमान बने व्यक्ति की असली दुकान कहाँ है, रावण का पात्र किसके खेत के पास रहता है और लक्ष्मण कल सुबह फिर स्कूल या बाजार में दिखाई देगा। फिर भी मंच पर मुकुट पहनते ही वे रोजमर्रा के परिचय से ऊपर उठ जाते थे।
किसी छोटे उत्तर भारतीय कस्बे की रामलीला अपेक्षाकृत संक्षिप्त और स्थानीय मंच-केंद्रित हो सकती है। वहाँ वही रामचरितमानस की कथा दस-बारह दिनों में पूरी होती है, लेकिन स्थानीय कलाकार, स्थानीय बोली, स्थानीय हास्य और उस कस्बे की सामाजिक स्मृतियाँ उसमें अपना रंग भर देती हैं। अधिकांश रामलीलाएँ इसी तरह लगभग 10–12 दिनों में होती हैं, जबकि रामनगर जैसी परंपराएँ पूरे महीने तक चलती हैं।
शहर की रामलीला
शहर में यही परंपरा विशाल मैदान, संगठित समिति, बाहर से आई मंडली, प्रकाश, ध्वनि, जुलूस, अलग-अलग लीला-स्थलों और बड़े रावण-पुतलों का रूप लेती थी। कानपुर के परेड मैदान की रामलीला की शुरुआत 1877 में पंडित प्रयाग नारायण तिवारी द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है; बाद में मथुरा की मंडलियाँ मुख्य पात्र निभाने लगीं और मंचन-परंपरा ने आधुनिक तकनीक भी अपनाई।
लखनऊ के ऐशबाग में पहले मैदान के मध्य गहरा मंच था और दर्शक चारों ओर ऊँचे, सीढ़ीनुमा स्थानों पर बैठते थे। समय के साथ उसी लीला ने आधुनिक मंच और डिजिटल प्रसारण अपना लिया। ऐशबाग की परंपरा से नवाबी संरक्षण और गंगा-जमुनी सांस्कृतिक सहभागिता की कथाएँ भी जुड़ी हैं।
मूल अंतर यह था: गाँव की रामलीला सामुदायिक निकटता का रंगमंच थी; शहर की रामलीला सामूहिक विराटता का। गाँव में दर्शक पात्र को व्यक्तिगत रूप से पहचानता था। शहर में दर्शक भीड़ का हिस्सा बनकर आयोजन की विशालता में स्वयं को भूलता था।
3. शहरवार किस्से और सांस्कृतिक रंग
कानपुर - कानपुर की परेड रामलीला उन्नीसवीं शताब्दी से चली आ रही शहरी परंपरा के रूप में दर्ज है। कानपुर का किस्सा एक औद्योगिक शहर के बीच परंपरा का अस्थायी नगर खड़ा करने का है। दिन में व्यापार, मिल, बाजार और ट्रैफिक वाला परेड क्षेत्र रात में कथा-भूमि बन जाता था। आधुनिक समय में ड्रोन, बड़ी लाइटिंग और प्रसारण जुड़ गए हैं, लेकिन “परेड जाना” अब भी केवल नाटक देखने से अधिक, पूरे शहर की भीड़ में शामिल होने का अनुभव है।
लखनऊ - ऐशबाग के बारे में प्रचलित विवरण इसे तुलसीदास की परंपरा से जोड़ते हैं; समिति की औपचारिक स्थापना 1860 में बताई गई है। प्रकाशित कथाओं के अनुसार अवध के नवाबों ने रामलीला को भूमि और संरक्षण दिया। लखनऊ की विशेषता यह है कि यहाँ रामलीला सांस्कृतिक गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा बनती है। हिंदी, उर्दू और कभी पंजाबी की छाया, संगीत में मुस्लिम कलाकार, नवाबी संरक्षण और आधुनिक डिजिटल मंच, सब एक ही परंपरा की अलग परतें हैं।
प्रयागराज - प्रयागराज की रामलीला की पहचान केवल स्थिर मंच से नहीं, बल्कि चौकियों, विमानों और नगर-मार्गों से जुड़ी है।पजावा रामलीला के आधुनिक विवरण में विशाल हनुमान आकृति के “आकाश मार्ग” से आगमन और राम-रावण युद्ध की नाटकीय प्रस्तुति का उल्लेख मिलता है। मुहल्ला दर्शकदीर्घा बनता है, छतें बालकनी और सड़क चलती हुई रंगशाला।
वाराणसी - रामनगर की रामलीला एक मुक्ताकाशीय, बहु-स्थलीय परंपरा है। रामनगर की रामलीला इसका सबसे शानदार उदाहरण है। यहाँ रामलीला किसी एक मंच पर होने वाला नाटक नहीं है। लगभग 31 दिनों तक रामनगर का पूरा भूगोल मंच बन जाता है। अयोध्या से जनकपुर, चित्रकूट से लंका तक नगर का वास्तविक भूगोल पौराणिक भूगोल में बदल जाता है। यहाँ दर्शक कुर्सी पर बैठा स्थिर उपभोक्ता नहीं रहता। उसे कथा के साथ चलना पड़ता है। इसीलिए बनारस की रामलीला को “ड्रामा” से अधिक सामूहिक यात्रा और अनुष्ठान कहा जा सकता है। उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशिराज उदित नारायण सिंह से इसकी शुरुआत जोड़ी जाती है और जेम्स प्रिंसेप ने 1830 में इसका आँखों-देखा विवरण प्रकाशित किया था।
मिर्जापुर - मिर्जापुर के बरियाघाट की रामलीला और दशहरा मेला भी स्थानीय स्मृति, धार्मिक आस्था तथा नगर की सामूहिक भागीदारी से जुड़ी रामलीला-परंपरा का हिस्सा रहे हैं।
4. बच्चों के लिए मेला: वास्तविकता से बड़ा संसार
बच्चों की स्मृति में रामलीला का अर्थ केवल संवाद सुनना नहीं था। लीला तक पहुँचने की तैयारी ही उसका पहला दृश्य थी:
- पिता की उँगली पकड़कर अँधेरी सड़क या खेत की मेड़ से मैदान तक जाना।
- दूर से दिखाई देती पेट्रोमैक्स या बिजली की झालर।
- गुब्बारे, बाँसुरी, कागज के चश्मे और रंगीन मुखौटे।
- लकड़ी या टीन के धनुष-बाण।
- मिट्टी की सीटी, चरखी और झूला।
- जलेबी, खील-बताशे, रेवड़ी, मूँगफली और चाट।
- भीड़ में खो जाने का डर और मेले से वापस न लौटने की गुप्त इच्छा।
बच्चे के लिए रावण का पुतला सचमुच जीवित प्राणी के समान था। वह दिन में निर्माणाधीन दिखाई देता था, शाम तक अँधेरे के विरुद्ध खड़ा हो जाता और रात को आग में विलीन हो जाता। इसीलिए उसका दहन केवल अच्छाई की बुराई पर जीत का धार्मिक संदेश नहीं था। बच्चे की दृष्टि में वह डर को आकार देना और फिर उस आकार को जलते देखना था।
5. रामलीला का असली दृश्य: मंच के पीछे
पुरानी रामलीला की भव्यता अक्सर सीमित साधनों से तैयार होती थी। मंच पर महल दिखता था, पीछे बाँस की टेक, रस्सियों की गाँठें, रंग लगे चेहरे, गत्ते के मुकुट, पीतल या लकड़ी की गदाएँ और संवाद याद करता कलाकार होता था। परंपरागत रामलीला में व्यास या सूत्रधार संवाद की गति नियंत्रित करता, अभिनेताओं को संकेत देता और मंचीय व्यवस्था संभालता था। कई जगह मानस की चौपाइयों और दोहों का सामूहिक गायन मंचन के साथ चलता था।
पात्रों की देह पर रामरज लगती है, चेहरे पर पाउडर और रंगीन बिंदियाँ सजती हैं, और बालक पानी लाने तथा पंखा झलने जैसे छोटे काम करके स्वयं को लीला का हिस्सा समझता है। यह विवरण बताता है कि मंच के पीछे का श्रम किसी बच्चे के लिए भी उतना ही जादुई था, जितना सामने का अभिनय।
रामलीला की पुरानी व्यवस्था मोटे तौर पर चार संसारों को जोड़ती थी:
- पाठ और अभिनय: रामचरितमानस, संवाद, चौपाई और स्थानीय बोली।
- हस्तकला: मुकुट, मुखौटे, धनुष, गदा, वस्त्र, पुतले और मंच-सज्जा।
- संगीत: नगाड़ा, ढोल, हारमोनियम, झाँझ और उद्घोषणा।
- सामुदायिक प्रबंधन: चंदा, स्वयंसेवक, बैठने की व्यवस्था, जुलूस और सुरक्षा।
6. मुस्लिम भागीदारी: पुतले की बाँस-बल्लियों में दर्ज साझा संस्कृति
मुस्लिम कारीगरों द्वारा रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाना कोई सतही “सांप्रदायिक सद्भाव” का फोटो-अवसर भर नहीं रहा है। अनेक स्थानों पर यह पीढ़ियों से चली आ रही व्यावसायिक, कलात्मक और स्थानीय परंपरा है।
कानपुर के लाजपत नगर और गाजियाबाद की सुल्लामल रामलीला में मुस्लिम परिवार की लगभग पाँच पीढ़ियाँ पुतले बनाती रही थीं। कारीगर मोहम्मद आजाद ने अपने पिता और दादा के साथ बचपन से यह काम सीखने की बात कही। परिवार के सदस्य निर्माण पूरा होने तक मैदान में रहते और तीनों पुतलों को तैयार करने में लगभग एक महीना लगाते थे। उनके अनुसार यह काम उन्हें अपने दादा और पिता से विरासत में मिला था।
लखनऊ की रामलीला-संस्कृति में सहभागिता केवल पुतला-निर्माण तक सीमित नहीं दिखती। मौसमगंज की रामलीला की शुरुआत हिंदू-मुस्लिम सहभागिता से जुड़ी बताई गई है और एक स्थानीय विवरण में इकबाल द्वारा कीबोर्ड पर रामधुन बजाने तथा तेलीबाग की बाल रामलीला में रेहाना द्वारा सीता की भूमिका निभाने का उल्लेख मिलता है।
7. रावण-दहन: एक क्षण जिसके पीछे महीनों का श्रम
रावण-दहन कई स्तरों पर काम करता है। पहला स्तर कथा का है: राम का बाण और बुराई पर अच्छाई की विजय। दूसरा स्तर प्रदर्शन का है: पुतले की ऊँचाई, आतिशबाजी, चेहरे की बनावट, घूमती आँखें या मुँह से निकलती आग। तीसरा स्तर सामुदायिक प्रतीक्षा का है: पूरी रामलीला का चरम बिंदु। चौथा स्तर कारीगरों का है: जिस आकृति को बनाने में कई सप्ताह लगे, वह कुछ मिनटों में जल जाती है।
यही विरोधाभास रावण-दहन को गहरा दृश्य बनाता है। पुतला नष्ट होता है, लेकिन शिल्प हर वर्ष दोहराया जाता है। रावण हर साल नया बनता है, क्योंकि समाज को हर साल अपनी “बुराई” का नया आकार गढ़ना पड़ता है।
फिर भी बीते दौर की स्मृति में सबसे प्रभावशाली दृश्य शायद आग नहीं, आग से पहले का ठहराव था: दूर खड़ा ऊँचा पुतला, उसके पैरों के पास छोटे दिखाई देते लोग, बच्चों के कंधों पर बैठे बच्चे, घोषणा की आवाज, बाण छूटने की प्रतीक्षा और फिर अचानक उठती लपट।
8. परिचित कथा में नई दृष्टि
इसी परंपरा की आधुनिक मिसाल आशुतोष राणा का Humare Ram भी है, जिसमें वे रावण को केवल परिचित “खलनायक” के रूप में नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, व्यक्तित्व और राम के साथ उसके जटिल संबंधों की नई परतों के साथ प्रस्तुत करते हैं।
शायद महान कहानियों की खूबी यही है कि उनकी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि दर्शक को कहानी पता है या नहीं, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि दर्शक उसी जानी-पहचानी कहानी में कुछ ऐसा नया देखना चाहता है, जो पहले उसकी नजर से छूट गया था।
रामायण की तरह ही DC या Marvel का multiverse भी इसी आकर्षण पर चलता है। पात्र और उनकी मूल पहचान परिचित रहती है, लेकिन अलग universe, समय, परिस्थिति या दृष्टिकोण में वही पात्र एक बिल्कुल नई कहानी और नई संभावना खोल देते हैं।
समेकित टिप्पणी: बीते युग की रामलीला किस चीज का नाम थी?
बीते युग की रामलीला “कम साधनों का बड़ा संसार” थी। वह स्क्रीन से पहले का सामूहिक दृश्य-माध्यम थी, लेकिन निष्क्रिय मनोरंजन नहीं। लोग उसमें चलते, चंदा देते, पात्र सजाते, दुकान लगाते, ढोल बजाते, बच्चों को कंधे पर बैठाते और पुतले बनाते थे।
गाँव में रामलीला ने समुदाय को स्वयं अपना कलाकार बनाया। शहर में उसने भीड़ को अस्थायी नागरिक समुदाय में बदला। बच्चों के लिए उसने साधारण मैदान को जादुई प्रदेश बनाया। मुस्लिम कारीगरों और कलाकारों की भागीदारी ने दिखाया कि किसी धार्मिक उत्सव की दृश्य-संस्कृति अक्सर साझा श्रम से बनती है। रावण-दहन ने कथा को नाटकीय अंत दिया, लेकिन असली परंपरा राख में नहीं, अगले साल फिर बाँस खड़ा करने की निरंतरता में थी।
आज मंच अधिक चमकीला, ध्वनि अधिक तेज और दृश्य डिजिटल हो सकता है। पर पुरानी रामलीला की सबसे बड़ी पूँजी तकनीक नहीं थी। उसकी पूँजी थी प्रतीक्षा। कई दिनों तक कथा के साथ चलना, रोज उसी मैदान को फिर एक नए लोक में बदलते देखना, और दशहरे की रात उस संसार को आग में समाप्त होते देखकर अगली बार की प्रतीक्षा शुरू कर देना।




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