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दूरदर्शन के यादगार कार्टून: DD1 और DD2 के बच्चों वाले सुनहरे दिन

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दूरदर्शन के सुनहरे कार्टून दिन: DD1 और DD2 पर बच्चों की यादगार दुनिया दूरदर्शन के दौर में कार्टून सिर्फ मनोरंजन नहीं थे, बल्कि बचपन की रोज़मर्रा की खुशी का हिस्सा थे। DD1 और DD2 पर आने वाले भारतीय मूल के एनिमेटेड शो हों या हिंदी-डब्ड विदेशी कार्टून, हर कार्यक्रम अपने साथ रोमांच, हास्य, दोस्ती और सीख लेकर आता था। आर्काइव्स, फोरम्स और पुरानी यादों से जुड़ी कलेक्शन्स में व्यापक शोध के बाद, यहाँ DD National पर 1980s और 1990s में प्रसारित हुए कार्टूनों और एनिमेटेड कार्यक्रमों की अब तक उपलब्ध सबसे संपूर्ण सूची प्रस्तुत है: 1) DD1 और DD2 से जुड़े भारतीय मूल के कार्टून Bongo — बोंगो अपनी मज़ेदार हरकतों और हल्के-फुल्के रोमांच से बच्चों को हँसी और उत्सुकता दोनों देता था। Ghayab Aya — “ग़ायब आया” रहस्य, शरारत और कल्पना का ऐसा मेल था, जो बच्चों को हर एपिसोड में चौंका देता था। Potli Baba Ki — गुलज़ार का यह शानदार कठपुतली शो नैतिक कहानियों और संवेदनशील प्रस्तुति के लिए खास याद किया जाता है।  ( Title Song Lyrics ) Tales of Panchatantra — पंचतंत्र की पारंपरिक कहानियों पर आधारित यह शो बच्चों क...

सिंगल-स्क्रीन का संस्कार: छोटे शहरों की सामूहिक सिनेमाई स्मृति

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सिनेमाई संस्कार: सिंगल-स्क्रीन थिएटर की स्मृति संस्कार मिलने के लिए दो “माया” होती थीं—एक माँ और दूसरा सिनेमा। माँ जीवन की पहली भाषा सिखाती थी, और सिनेमा दुनिया को देखने का तरीका। माँ से अच्छाई-बुराई की समझ मिलती थी, सिनेमा से भावनाओं की भाषा। माँ घर के भीतर का संसार खोलती थी, सिनेमा घर के बाहर का। छोटे कस्बों में तो सिनेमा कई बार किताब, अखबार, मेला और लोककथा—सबका सम्मिलित रूप लगता था। देवकी पैलेस, काकादेव, कानपुर  उस समय सिंगल-स्क्रीन थिएटर केवल फिल्म दिखाने की जगह नहीं था। वह छोटे शहरों की सामूहिक स्मृति था। वहाँ दर्शक केवल दर्शक नहीं होते थे—वे फिल्म के साथ जीते थे, ताली बजाते थे, सीटियाँ मारते थे, असहज होते थे, हँसते थे, डरते थे, और कई बार फर्स्ट क्लास टिकट के लिए लड़ भी पड़ते थे|  थिएटर एक इमारत भर नहीं था; वह शहर की धड़कन था। अंधेरे हॉल में 300 लोगों की एक धड़कन पुराने सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों का अनुभव अजीब तरह से निजी भी था और सामूहिक भी। अंधेरे हॉल में 300 लोग एक साथ फिल्म देखते थे, लेकिन हर आदमी उसे अपने-अपने तरीके से जीता था। कोई अपने प्रेम की कहानी ढूँढता था, कोई ही...

80s–90s : जब अनुशासन का दूसरा नाम था चप्पल, बेल्ट और मुरगा

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चेतावनी / सूचना:  यह कथा सत्य घटनाओं पर आधारित है। इसे गल्प मानना हमारे बचपन के अनुभवों का अपमान होगा। 80s–90s के भारतीय बचपन की एक सामूहिक स्मृति इतिहास कहता है कि पीछे मत देखो, लेकिन यादें कहाँ किसी की बंदिश सुनती हैं। वे अपनी मर्ज़ी से लौट आती हैं—कभी किसी पुरानी कॉपी की बुरी लिखावट में, कभी स्कूल के स्टील वाले स्केल की चमक में, कभी घर के दरवाज़े के पास पड़ी चप्पल में, और कभी पिताजी की उस नज़र में, जिसे देखकर आत्मा कांप जाती थी। हम उस पीढ़ी से आते हैं जहाँ बचपन केवल खेल, कॉमिक्स , VCR और गर्मियों की छुट्टियों का नाम नहीं था। वह अनुशासन, डर, शर्मिंदगी, बचाव-प्रयास और माँ की अंतिम अपील का भी नाम था। आज यह सब लिखते हुए हँसी आती है, लेकिन उस समय हँसी नहीं आती थी।  और सच कहूँ तो यह केवल मेरी कहानी नहीं है। 80s–90s के भारतीय बच्चों ने स्कूलों की मार, स्केल, बेंत, सार्वजनिक शर्मिंदगी और घर के डर को अपने बचपन का हिस्सा बताया है |उस दौर में काउंसलिंग नहीं थी, पॉजिटिव पेरेंटिंग नहीं थी, और "चाइल्ड साइकोलॉजी" तो शायद शब्दकोशों में ही मिलती थी। अनुशासन के अपने तरीके थे—घर के और स...

कानपुर की बिजली कथा: केसा, कटिया और कुपित पिताजी

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90s के कानपुर की गर्मी का अपना अलग ही साउंडट्रैक था—दूर कहीं जनरेटर की घर्र-घर्र, गलियों में बच्चों की आवाज़ें, छतों पर बिछी चारपाइयाँ, हाथ से झलते पंखे, और अचानक पूरे मोहल्ले में उठती एक सामूहिक घोषणा -  “ बत्ती चली गई!” आज बिजली जाना एक असुविधा लगता है, लेकिन तब वह रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। जैसे शाम होगी, खाना बनेगा, मच्छर आएँगे—वैसे ही कभी न कभी बत्ती भी जाएगी। और बत्ती जाते ही घर का पूरा भूगोल बदल जाता था। पंखा रुकता, कूलर लोहे का डिब्बा बन जाता, ऑल आउट बेअसर हो जाता और फिर कछुआ छाप कॉइल या मच्छरदानी की बारी आती। 90s में बत्ती जाती थी तो मनोरंजन का आखिरी सहारा अक्सर रेडियो होता था । कभी विविध भारती, कभी क्रिकेट कमेंट्री, कभी समाचार, और कभी पुराने गाने| अगर रात में सुसू लग जाए, तो अँधेरे में टॉर्च ढूँढना, भूतों के डर से हनुमान चालीसा याद करते हुए बाथरूम तक जाना और वापस आना अपने आप में एक छोटी-सी एडवेंचर फिल्म जैसा लगता था। कानपुर की बारिश का अपना अलग ही स्वैग था। बादल घिरते ही हवा में मिट्टी की खुशबू फैल जाती, गली के लौंडे चिल्लाने लगते —“ अबे पानी बरसिहै !” लेकिन 90 के ...