90 के दशक की बाल और किशोर पत्रिकाएँ
रेलवे स्टेशनों पर ए एच व्हीलर की दुकानों ने कई पीढ़ियों को पाठक बनाया और किताबों को लोकप्रिय बनाया।दुकान के बाहर सजी बाल पत्रिकाओं के बीच में 'चंपक' दिख गई जो अब ए फोर साइज में छपती है। हमारे समय में यह किताब के आकार में छपती थी। इसके साथ याद आ गई पराग, नंदन, चंदामामा, लोटपोट, ट्विंकल और ढेर सारी कामिक्स सीरीज। इन पत्रिकाओं के साथ बीता बचपन यानी जीवन का स्वर्णिम युग।
दिवाली—पर जब हम ट्रेन से यात्रा करते थे, पिता जी अक्सर हमें रास्ते में पढ़ने के लिए किताबें लाकर देते थे। वे आम तौर पर "चंपक" और "नंदन" जैसी किताबें खरीदना पसंद करते थे, क्योंकि उनमें कई छोटी-छोटी कहानियाँ होती थीं और एक के बाद एक पढ़ते-पढ़ते समय जल्दी कट जाता था। छोटी बहन चंपक की कहानियों से बहुत खुश रहती थी, जबकि मैं कॉमिक्स का दीवाना था और बार-बार उसी रोमांच का इंतज़ार करता था। एक बार मैंने हिंदी में He-Man की कॉमिक्स खरीद ली—ट्रेन की पूरी यात्रा में वह किताब मेरे साथ रही और मैं उसे बार-बार पढ़ता रहा। जब हमें बैठने की जगह मिली तो भी मेरी रुचि कम नहीं हुई; मैं लगातार कॉमिक्स में खोया रहा और वह सफर कहानी और चित्रों के साथ यादगार बन गया।
रावतपुर (कानपुर) की उस दुकान से भी बाल पत्रिकाएँ आती थीं, और सलेमपुर में एक सरदार जी थे—वहाँ भी अख़बार और पत्रिकाएँ मिलती थीं। उन दुकानों तक पहुँचते ही लगता था जैसे 90 के दशक की अपनी एक छोटी-सी दुनिया सामने खुल गई हो।
नन्हे सम्राट
नन्हे सम्राट ८० और ९० के दशक की लोकप्रिय बाल-पत्रिका थी, जिसमें कहानियाँ, खेल, पहेलियाँ, कॉमिक्स और चित्रकथाएँ एक साथ मिलती थीं। यह उन बच्चों के लिए थी, जो केवल नैतिक कहानियाँ नहीं, बल्कि रोमांच, हास्य और कॉमिक पात्रों की दुनिया भी पढ़ना चाहते थे। इंटरनेट अभिलेखागार पर इसका १९९२ का अंक उपलब्ध है और उसे कहानियों, खेलों और कॉमिक्स वाली बाल-पत्रिका के रूप में दर्ज किया गया है।
इस पत्रिका की खास पहचान सुखवंत कलसी से जुड़ती है। उनकी ‘मूर्खिस्तान’ कॉमिक पट्टी नन्हे सम्राट में प्रकाशित हुई थी | नन्हे सम्राट के सबसे लोकप्रिय व्यंग्य स्तंभों में से एक था “मूर्खिस्तान”। यह एक काल्पनिक देश था, जहाँ सब कुछ उल्टा-पुल्टा होता था। उसकी शैली कुछ ऐसी होती थी | मूर्खिस्तान का:
- राष्ट्रीय पशु: गधा
- राष्ट्रीय पक्षी: उल्लू
- राष्ट्रीय फूल: फूलगोभी
- राष्ट्रीय खेल: दूसरों की टाँग खींचना
- राष्ट्रीय भाषा: बेतुकी बातें
- राष्ट्रीय धंधा: कामचोरी
- राष्ट्रीय गान: सारे जहाँ से महान, हमारा प्यारा मूर्खिस्तान
- राष्ट्रीय मानचित्: प्रश्नचिह्न
जावेद अलम शामसी का नाम बहुत महत्वपूर्ण है, जो इस पत्रिका के लिए लगभग 23 वर्षों तक चित्रण और लेखन करते रहे हैं। इसके अलावा प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट और लेखक सुखवंत कलसी भी नन्हे सम्राट की कॉमिक स्ट्रिप्स जैसे "मूर्खिस्तान" और "जूनियर जेम्स बॉन्ड" के लिए जाने जाते थे।
“हा हा, ही ही, हू हू” जैसा चुटकुला खंड बच्चों की भाषा में हास्य का बहुत प्यारा रूप था। नाम ही ऐसा था कि पन्ना खोलते ही हँसी का माहौल बन जाता था। इसमें छोटे-छोटे चुटकुले, स्कूल वाले मजाक, मास्टरजी-छात्र संवाद, पति-पत्नी के बजाय बच्चों के स्तर वाली नोकझोंक तथा जानवरों और मूर्ख पात्रों पर आधारित हास्य आते होंगे।
“आप हैं जासूस कीजिए महसूस अथवा "पहचानिए अंतर” जैसा खंड भी नन्हे सम्राट की बड़ी पहचान था। इसमें दो मिलते-जुलते चित्र दिए जाते थे और बच्चों को उनके बीच अंतर ढूँढ़ने होते थे। नन्हे सम्राट में हिंदी वर्ग पहेली भी आती थी। यह उसका बहुत मजबूत शैक्षिक हिस्सा था। यह अंग्रेज़ी वर्ग पहेली की तरह नहीं, बल्कि हिंदी शब्दों, पर्यायवाची शब्दों, सामान्य ज्ञान और छोटे संकेतों पर आधारित होती थी। हर अंक में कई पृष्ठ होते थे:चित्र पहेली, शब्द खोजो, भूलभुलैया, अंतर ढूँढ़ो और गणितीय पहेलियाँ |
नन्हे सम्राट में मनोहर चमोली ‘मनु’ की कहानियां बच्चों को राजकुमारों, तिलिस्मी नदियों, बोलते वृक्षों और नैतिक दुविधाओं की दुनिया में ले जाती थीं। पी. आर. शुक्ला की “वृक्ष कथा” नन्हे सम्राट की उन कहानियों में रही होगी, जिनमे शहजादा सलीम किसी की मदद कर वापिस तिलस्मी नदी के किनारे आ पहुंच जाता था। ये कहानियाँ केवल रोमांच नहीं थीं, बल्कि पेड़, जंगल, रहस्य, लोककथा, बुद्धि, करुणा और संवेदना की छोटी-छोटी पाठशालाएँ थीं। यह सीधे उपदेश देने वाली कहानी नहीं होती थी, बल्कि कहानी के भीतर कोई प्रश्न, संकट या रहस्य रखा जाता था। बच्चे को लगता था कि वह किसी राजकुमार के साथ एक तिलिस्मी दुनिया में चल रहा है। ऐसी कहानियाँ २ से ३ अंकों तक चलती थीं, इसलिए उनका असर ज्यादा गहरा होता था। नरेन्द्र सिंघवी की कहानियाँ भी उसमें प्रकाशित होती थीं, तो यह उसके कहानी-संसार को और मजबूत बनाता है।
नन्हे सम्राट में “बच्चों को दुनिया से मिलाने” वाला साक्षात्कार खंड भी था। नन्हे सम्राट में अमन इंदरजीत सिंह बिट्टा का पाठकों को जवाब देने वाला हिस्सा भी बहुत यादगार रहा होगा। यह बच्चों के लिए सिर्फ़ प्रश्नोत्तर नहीं था, बल्कि पत्रिका से निजी रिश्ता बनाने का माध्यम था। बच्चे अपने नाम से पत्र भेजते थे, सवाल पूछते थे, मजेदार बातें लिखते थे और जब जवाब छपता था, तो लगता था कि पत्रिका सचमुच उनसे बात कर रही है।
बालहंस
बालहंस ९० के दशक की हिंदी बाल-पत्रिका संस्कृति का एक प्यारा और थोड़ा कम आँका गया नाम था। यह राजस्थान पत्रिका समूह द्वारा बच्चों के लिए प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका थी, जिसका प्रकाशन अब बंद हो चुका है। इसमें बच्चों के लिए कहानियाँ, हास्य-कथाएँ, पशु-कथाएँ, चित्रकथाएँ, पहेलियाँ, कविताएँ, ज्ञानवर्धक लेख और हल्की-फुल्की मनोरंजक सामग्री आती थी।
बालहंस का स्वर 'नंदन' की तरह अपेक्षाकृत साहित्यिक और 'चंपक' की तरह सरल-मनोरंजक दुनिया के बीच का था। इसमें बच्चों को नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियाँ भी मिलती थीं और कल्पना व हास्य से भरी सामग्री भी। हर अंक में कोई नई कहानी, कोई मजेदार पहेली, कोई रंगीन चित्र और बच्चों की अपनी छोटी-सी दुनिया खुलती थी।
इसमें पौराणिक कथाएँ अपेक्षाकृत कम और वास्तविक जीवन, प्रकृति, विज्ञान, समाज और बच्चों की रोज़मर्रा की जिज्ञासाओं से जुड़ी सामग्री अधिक मिलती थी।
आपके दिए हुए अंक के अनुक्रम से भी यह बात साफ दिखाई देती है कि इसमें अमर चित्र कथा से ली गई महाभारत की चित्रकथा, “पून-पून” नाम की कुत्ते पर आधारित कॉमिक पट्टी, “घाघ की कहावतें”, “उजली छाया” के अंतर्गत प्रकाशित कविताएँ, पुरस्कार-प्राप्त कहानियाँ, महान व्यक्तित्वों के उद्धरण और पेड़-पौधों, पक्षियों, ब्रह्मांड या प्रकृति से जुड़े वैज्ञानिक लेख छपते थे।
इसके अलावा “आती-पाती” नाम से पाठकों के पत्रों का स्तंभ भी था, जो बच्चों को पत्रिका से सीधे जोड़ता था। इसमें केवल कहानी पढ़ने का आनंद नहीं था, बल्कि पाठक के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की खुशी भी थी। “पुरस्कार प्राप्त कहानी” जैसी सामग्री बच्चों में साहित्यिक रुचि और गुणवत्ता-बोध पैदा करती थी। महान व्यक्तित्वों के उद्धरण बच्चों को छोटे-छोटे प्रेरक वाक्यों के माध्यम से विचार और चरित्र की दिशा देते थे।
बालहंस बच्चों की पत्रिका होते हुए भी बहुत विविध, जीवंत और पूरी पत्रिका जैसा व्यापक स्वरूप रखती थी। यह एक ऐसी पत्रिका थी, जो छोटे शहरों और कस्बों के बच्चों को बताती थी कि दुनिया केवल परियों, राजाओं और देवताओं की नहीं है, बल्कि पेड़ों, पक्षियों, खिलाड़ियों, वैज्ञानिक खोजों, लोककथाओं, कहावतों, कविताओं और अपने जैसे पाठकों के पत्रों से भी बनी है। यही कारण है कि बालहंस को ९० के दशक की हिंदी बाल-पत्रिका परंपरा में वास्तविक दुनिया से जुड़ी, जिज्ञासा बढ़ाने वाली और पाठक-भागीदारी वाली पत्रिका के रूप में याद किया जाना चाहिए।
बालहंस का वह विशेषांक, जिसमें राजस्थान और सिंध की प्रसिद्ध प्रेम-कथाएँ थीं, बहुत महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए, क्योंकि यह बच्चों को भारतीय उपमहाद्वीप की लोक-स्मृति से परिचित कराता था। इसमें प्रेम को केवल रोमानी अर्थ में नहीं, बल्कि लोककथा, साहस, विरह, सामाजिक बंधन, रेगिस्तानी जीवन, यात्राओं, प्रतीक्षा और लोकगीतों की स्मृति के रूप में प्रस्तुत किया गया होगा। ढोला-मारू की विरह-यात्रा, मूमल-महेन्द्रा का आकर्षण, उमर-मारवी की अस्मिता, सस्सी-पुन्नू का संघर्ष, सोहनी-महिवाल का विछोह और मिर्ज़ा-साहिबाँ जैसी कथाएँ बच्चों के लिए लोककथा और इतिहास के बीच की दुनिया खोलती थीं।
नंदन
नंदन हिंदुस्तान टाइम्स समूह की हिंदी बाल-पत्रिका थी, जिसकी शुरुआत १९६४ में पंडित नेहरू की स्मृति में हुई। इसमें पौराणिक कथाएँ, परी-कथाएँ, प्रेरक प्रसंग, जीवनियाँ, ज्ञानवर्धक लेख, कविताएँ और संवादात्मक स्तंभ आते थे।
नंदन में आने वाला “विश्व की महान कृतियाँ” जैसा स्तंभ बहुत विशेष tha, क्योंकि ऐसी सामग्री बच्चों को यह बताती थी कि साहित्य केवल अपने मोहल्ले, अपने शहर या अपने देश तक सीमित नहीं है। दुनिया में बड़े-बड़े लेखकों ने ऐसी रचनाएँ लिखी हैं, जो अलग संस्कृति, अलग समय और अलग समाज से आती हैं, लेकिन उनमें मनुष्य की मूल भावनाएँ समान रहती हैं।
ऐसी कृतियों को बच्चों के लिए ४ से ५ पृष्ठों में, सरल भाषा में और अक्सर सचित्र रूप में प्रस्तुत करना एक बड़ा काम था। बच्चे सीधे मूल भारी-भरकम साहित्य नहीं पढ़ सकते थे, लेकिन नंदन उन्हें उस साहित्य की झलक दे देती थी। इससे बच्चों के मन में यह जिज्ञासा पैदा होती थी कि दुनिया में कितनी कहानियाँ हैं, कितने देश हैं, कितने तरह के पात्र हैं और कितने तरह के जीवन हैं। बाद में जब वही बच्चे बड़े हुए, तो उन्होंने उपन्यास, कहानी, विश्व साहित्य, अनुवाद और पारंपरिक महान रचनाओं की ओर कदम बढ़ाया।
नंदन की एक और बड़ी पहचान थी उसका सचित्र संसार। आज के बच्चों के लिए चित्रों की कमी नहीं है, लेकिन ८० और ९० के दशक में चित्र अपने-आप में घटना होते थे। इसकी लोकप्रिय चित्रकथा चीटू-नीटू थी, जिसे सुशील कालरा ने बनाया। नंदन का आकर्षण यह था कि यह बच्चों को केवल सीख नहीं देती थी, बल्कि पढ़ने की आदत और भाषा का आनंद भी देती थी। बाल कविता का काम केवल तुकबंदी करना नहीं होता। अच्छी बाल कविता बच्चे की भाषा को संगीत देती है। वह उसे शब्दों की मिठास, लय, चित्र और भाव सिखाती है। नंदन की बाल कविता बच्चों के मन की कल्पनाओं, खुशियों और सीख को सरल शब्दों में सुंदर ढंग से व्यक्त करती है।
नंदन की कहानियों में विविधता थी। एक तरफ़ राजा-रानी की परंपरागत कथाएँ मिलती थीं, दूसरी तरफ़ गाँव, स्कूल, परिवार, पशु-पक्षी, दोस्ती, साहस और बुद्धिमानी पर आधारित कहानियाँ होती थीं। राजा-रानी की कहानियाँ बच्चों को इसलिए पसंद आती थीं, क्योंकि उनमें रहस्य, न्याय, दरबार, संकट, चालाक मंत्री, दयालु रानी, चतुर राजकुमार, परीक्षाएँ और अंत में किसी नैतिक समाधान का सुख होता था। नंदन में राजा-रानी की कहानियों की लोकप्रियता का कारण सिर्फ़ राजमहल या ताज नहीं था। इनमें भारतीय लोककथा की लंबी परंपरा जीवित रहती थी। नंदन में "तेनालीराम" की एक पृष्ठ की कहानी विशेष आकर्षण होती थी।
“नंदन बाल समाचार” जैसी सामग्री बहुत महत्वपूर्ण थी। यह बच्चों को समाचार-पत्र की दुनिया से परिचित कराती थी, लेकिन ऐसी भाषा में जिसे बच्चा समझ सके। इसमें विज्ञान, खेल, शिक्षा, देश-दुनिया, उपलब्धियाँ, रोचक तथ्य और बच्चों से संबंधित घटनाएँ हो सकती थीं। ९० के दशक में हर बच्चे के पास रंगीन दूरदर्शन या इंटरनेट नहीं था। ऐसे में पत्रिका में छपे चित्र बच्चों के लिए दुनिया देखने का माध्यम थे। कोई अंतरिक्ष अभियान, कोई खेल उपलब्धि, कोई ऐतिहासिक जगह, कोई वैज्ञानिक खोज, कोई वन्यजीव या कोई सांस्कृतिक आयोजन, ये सब चित्रों के माध्यम से अधिक जीवंत हो जाते थे। नंदन का “ज्ञान-पहेली” जैसा स्तंभ बच्चों में तर्क और जिज्ञासा जगाता था। नंदन में “पत्र मिला” या “पत्र-मित्र” जैसे स्तंभ बच्चों के लिए बहुत रोमांचकारी होते थे।
नंदन जैसे पत्रों में “आओ बात करें” जैसा स्तंभ बच्चों के लिए बहुत आत्मीय होता था। यह वैसा हिस्सा था, जहाँ पत्रिका बच्चे से सीधे बात करती थी। नंदन की आत्मा उसके संपादकीय स्वर में थी। विशेष रूप से “तुम्हारा भैया” जयप्रकाश भारती की चिट्ठी जैसी चीज़ों में वह आत्मीयता थी, जो आज के डिजिटल युग में दुर्लभ लगती है। बच्चों के लिए संपादक कोई दूर बैठा हुआ व्यक्ति नहीं लगता था। वह “भैया” था, जो बच्चों से सीधे बात करता था। यह संबोधन अपने-आप में बहुत बड़ा सांस्कृतिक संकेत था।
चंपक
चंपक दिल्ली प्रेस की प्रसिद्ध बाल-पत्रिका थी, जो हिंदी सहित अनेक भाषाओं में प्रकाशित हुई। इसमें पशु-पात्रों वाली कहानियाँ, चुटकुले, पहेलियाँ, दिमागी खेल और नैतिक कहानियाँ आती थीं। इसकी दुनिया चंपकवन और चीकू जैसे पात्रों से पहचानी जाती थी। यह लेखक-केंद्रित पत्रिका कम और संपादकीय दल द्वारा संचालित पत्रिका अधिक थी, इसलिए व्यक्तिगत लेखकों के नाम बहुत प्रमुख रूप से उपलब्ध नहीं मिलते। इसकी बड़ी खूबी सरल भाषा, रंगीन प्रस्तुति, बच्चों के लिए हस्तकला, पहेलियाँ और छोटी-छोटी गतिविधियाँ थीं।
मीकू चूहा अक्सर चीकू का साथी बनकर आता था। वह छोटा था, लेकिन कहानी में उसकी मौजूदगी से चीकू की चतुराई और दोस्ती दोनों उभरती थीं। चंपकवन में शेरसिंह राजा जैसा पात्र था। वह व्यवस्था, निर्णय और जंगल की चिंता का प्रतीक था। चीकू खरगोश चंपकवन का सबसे समझदार पात्र था। वह चोरी, धोखाधड़ी या किसी उलझन को अपनी बुद्धि, विज्ञान और कभी-कभी तकनीक के सहारे सुलझाता था। चंपक में एक और बड़ी याद थी धारावाहिक चित्रकथा, जिसके साथ “सोहनी” नाम जुड़ा हुआ याद आता है। यह शायद लेखक/रचनाकार का नाम था।
लोटपोट
लोटपोट बच्चों की हिंदी कॉमिक पत्रिका थी, जो मायापुरी समूह से जुड़ी रही। इसका शीर्षक १९६९ में पी. के. बजाज ने पंजीकृत कराया और पहला अंक उसी वर्ष प्रकाशित हुआ। लोटपोट में “आपके पत्र” जैसा हिस्सा बच्चों के लिए आज के टिप्पणी खंड जैसा था। फर्क इतना था कि तब बच्चे पोस्टकार्ड या अंतर्देशीय पत्र भेजते थे और फिर अगले अंक में अपना नाम खोजते थे। चाचा बातूनी को लिखे पत्रों में बच्चे अपनी पसंद, शिकायत, चुटकुले, सवाल और सुझाव भेजते थे। जब किसी बच्चे का नाम छप जाता था, तो वह सिर्फ़ पाठक नहीं रहता था, बल्कि लोटपोट परिवार का हिस्सा बन जाता था।
शेख चिल्ली लोटपोट कॉमिक्स का एक बेहद लोकप्रिय और यादगार पात्र था। 80 और 90 के दशक के बच्चों के लिए शेख चिल्ली केवल एक कॉमिक चरित्र नहीं, बल्कि हंसी और कल्पनाओं की दुनिया का बादशाह था। उसकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वह हमेशा हवाई किले बनाता रहता था। कोई छोटा सा काम हाथ में लेता और कुछ ही मिनटों में अपने सपनों में करोड़पति, राजा या दुनिया का सबसे बड़ा आदमी बन जाता। फिर कोई न कोई मजेदार घटना होती और उसका सपना टूट जाता। उसकी भोली-भाली बातें, अजीबोगरीब तर्क और हास्यास्पद कारनामे पाठकों को खूब हंसाते थे।
इसकी सबसे बड़ी पहचान मोटू-पतलू से बनी, जिन्हें चित्रकार कृपा शंकर भारद्वाज ने बनाया। इसमें शेख चिल्ली, नटखट नीतू, मिन्नी और देवा जैसे पात्र भी लोकप्रिय रहे। लोटपोट की खूबी थी सीधे-सादे हास्य, मोटे-पतले दोस्तों की जोड़ी, चालाकी-भोलापन और बच्चों को तुरंत हँसा देने वाली चित्रात्मक प्रस्तुति।
पुरानी कॉमिक्स में मोटू-पतलू का हास्य बहुत सीधा था। मोटू खाने का शौकीन था और खासकर समोसे का दीवाना था। पतलू अपेक्षाकृत समझदार था, लेकिन अक्सर मोटू के साथ मुसीबत में फँस जाता था। यही जोड़ी बाद में दूरदर्शन अनुप्राणन में फुरफुरी नगर की पूरी दुनिया बन गई। लोटपोट से निकला मोटू-पतलू सिर्फ़ दो पात्रों की कहानी नहीं रह गया। इसका अनुप्राणित संसार इतना बड़ा हुआ कि घसीटाराम, डॉ. झटका, इंस्पेक्टर चिंगम, जॉन द डॉन, बॉक्सर और चायवाला जैसे पात्र भी बच्चों के लिए रची गई इस दुनिया का हिस्सा हो गए।
मधु मुस्कान
मधु मुस्कान हिंदी कॉमिक्स संस्कृति की सबसे प्यारी पत्रिकाओं में से एक थी। यह बच्चों और किशोरों के लिए हास्य, रोमांच और चित्रकथाओं की दुनिया लेकर आती थी। इसका बड़ा हिस्सा कॉमिक कहानियों पर आधारित था, इसलिए यह सामान्य बाल-पत्रिका से अधिक कॉमिक-पत्रिका जैसा अनुभव देती थी।
इसके लोकप्रिय पात्रों में डैडी जी, बबलू, पोपट-चौपट, चकरम और चिरकुट, सुस्तराम-चुस्तराम, भूतनाथ और जादुई तूलिका, मिन्नी और डाकू पान सिंह जैसे नाम आते हैं। डैडी जी के रचयिता के रूप में हरीश एम. सूदन और डाकू पान सिंह से जुड़े लेखक के रूप में मुरली सुंदरम का नाम मिलता है। इसकी खासियत थी कि हर अंक में परिचित पात्रों की वापसी होती थी।
चंदामामा
चंदामामा बच्चों के लिए लोककथा, पौराणिक कथा, राजा-रानी, जादुई संसार और नैतिक कल्पना की पत्रिका थी। यह मूलतः तेलुगु में बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि द्वारा शुरू की गई थी और बाद में हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में लोकप्रिय हुई। इसके संपादकीय इतिहास में कोडवटिगंटी कुटुंबराव का नाम बहुत महत्वपूर्ण है, जिन्होंने इसे लंबे समय तक संपादित किया। दासरी सुब्रह्मण्यम जैसे लेखकों ने इसमें धारावाहिक और लोककथा-आधारित सामग्री लिखी। इसकी खासियत सुंदर चित्र, पारंपरिक कथन-शैली, विक्रम-बेताल जैसी कल्पनाशीलता और बच्चों को स्वप्न-जगत में ले जाने वाली भाषा थी।
सुमन सौरभ
सुमन सौरभ किशोरों और युवा पाठकों के लिए दिल्ली प्रेस की पत्रिका थी। यह १९८३ में शुरू हुई और इसमें विज्ञान, भूगोल, जीवनियाँ, सामान्य ज्ञान, कहानी और किशोर-मन से जुड़ी सामग्री आती थी। यह उन पाठकों के लिए थी, जो चंपक और नंदन से आगे बढ़कर दुनिया, विज्ञान, समाज, आजीविका और व्यक्तित्वों को समझना चाहते थे। इसके ९० के दशक के पुराने अंकों के उल्लेख भी मिलते हैं।
ट्विंकल
ट्विंकल मूलतः अंग्रेज़ी बाल-पत्रिका थी, लेकिन इसकी कहानियाँ और कॉमिक्स हिंदी पाठकों तक भी पहुँचीं। इसे अनंत पाई, यानी “अंकल पाई”, ने शुरू किया था। इसकी पहचान सुप्पंडी, शिकारी शंभू और तंत्री द मंत्री जैसे पात्रों से बनी। इसमें कॉमिक्स, कहानियाँ, पहेलियाँ, प्रश्नोत्तरी, प्रतियोगिताएँ और सामान्य ज्ञान की सामग्री आती थी। यह ऐसी पत्रिका थी, जहाँ मनोरंजन और ज्ञान साथ-साथ चलते थे। हिंदीभाषी क्षेत्रों में यह बहुत कम मिलती थी।
पराग
पराग टाइम्स समूह की हिंदी बाल-पत्रिका थी, जिसकी शुरुआत १९५८ में हुई। यह नौ वर्ष और उससे ऊपर के बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। इसके संपादकों में कन्हैयालाल नंदन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और हरिकृष्ण देवसरे जैसे बड़े नाम आते हैं। इसमें कहानियाँ, कविताएँ, बाल-नाटक, लोककथाएँ, विज्ञान-लेख और साहित्यिक सामग्री आती थी। पराग की विशेषता यह थी कि वह बच्चों को गंभीर, कल्पनाशील और संवेदनशील पाठक मानती थी।
बाल भारती
बाल भारती भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से निकलने वाली सलीकेदार हिंदी बाल मासिक पत्रिका रही है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार यह पत्रिका १९४८ से नियमित रूप से प्रकाशित होती रही है और इसका उद्देश्य बच्चों को स्वस्थ मनोरंजन देने के साथ-साथ शिक्षा, मानवीय मूल्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना रहा है।
९० के दशक में इसका स्वाद चंपक या लोटपोट से थोड़ा अलग था। लेकिन बाल भारती में एक शांत, शिक्षाप्रद और साहित्यिक गरिमा थी। इसमें कहानियाँ होती थीं, कविताएँ होती थीं और चित्रकथाएँ होती थीं, लेकिन उनके पीछे एक साफ उद्देश्य दिखाई देता था कि बच्चा सिर्फ़ हँसे नहीं, बल्कि थोड़ा सोचे भी।
बाल भारती में ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ को हिंदी बाल साहित्य की उस पीढ़ी के महत्वपूर्ण रचनाकारों में गिना जाता है जो पारंपरिक बाल साहित्य से आगे बढ़कर विज्ञान, नए विषयों और आधुनिक बाल-मनोविज्ञान को साहित्य में ला रही थी। हिंदी बाल साहित्य के इतिहास पर लिखे गए स्रोत उन्हें इस सक्रिय रचनाकार-पीढ़ी में स्पष्ट रूप से शामिल करते हैं।
चिल्ड्रेन्स नॉलेज बैंक: 90 के दशक के बच्चों का ज्ञानकोष
चिल्ड्रेन्स नॉलेज बैंक कोई साधारण किताब नहीं थी। यह पुस्तक महल द्वारा प्रकाशित वह बहु-भागीय श्रृंखला थी, जो 90 के दशक के असंख्य घरों में एक छोटे से ज्ञानकोष के रूप में सहेजकर रखी जाती थी। उस समय न इंटरनेट था, न गूगल, न मोबाइल फोन। बच्चों के मन में उठने वाले अनगिनत “क्यों?”, “कैसे?” और “क्या?” जैसे सवालों का जवाब यही किताब देती थी।
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह जटिल विषयों को बच्चों की समझ के अनुसार बेहद सरल भाषा में प्रस्तुत करती थी। मोमबत्ती का मोम कहाँ जाता है, दूध उबलकर बाहर क्यों आ जाता है, बिजली का झटका क्यों लगता है, खरगोश के कान लंबे क्यों होते हैं, ब्लैक बॉक्स क्या होता है, जीवाश्म कैसे बनते हैं, एफिल टॉवर क्यों बनाया गया, इंद्रधनुष कैसे बनता है, पृथ्वी गोल क्यों है, जैसे सैकड़ों प्रश्नों के रोचक और सरल उत्तर इसमें मिलते थे।
आज जानकारी की कोई कमी नहीं है। इंटरनेट पर हर विषय उपलब्ध है, लेकिन अधिकांश सामग्री या तो बहुत तकनीकी होती है, या फिर विदेशी भाषा और संदर्भों में लिखी जाती है। इसके विपरीत, चिल्ड्रेन्स नॉलेज बैंक बच्चों के स्तर पर उतरकर ज्ञान को इतना सरल बना देती थी कि न केवल उत्तर समझ में आता था, बल्कि विषय के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ती थी।
घर की अलमारी में रखे इसके भागों को खोलते ही बच्चा अपने छोटे से संसार से निकलकर विज्ञान, इतिहास, भूगोल, अंतरिक्ष, पशु-पक्षियों और मानव सभ्यता की अद्भुत दुनिया की यात्रा पर निकल पड़ता था। यह केवल जानकारी देने वाली पुस्तक नहीं थी, बल्कि सोचने, प्रश्न पूछने और दुनिया को समझने की प्रेरणा देने वाली मित्र थी।
Conclusion
IN PATRIKAAON ने बच्चों को लिखने और बोलने का आत्मविश्वास दिया। बच्चों के पत्र छपते थे, बच्चों की रचनाएँ आती थीं, प्रतियोगिताएँ होती थीं। इससे बच्चा पाठक से भागीदार बनता था।
bal bhaskar.. Hasti Duniya Children Magazine, पमपम चिल्ड्रन मैगजीन
PANCHTANYTTA,,, HITPADESH WERE PUBLISHED


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