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Books read in 2023

"Life's most persistent and urgent question is, 'What are you doing for others?'" Martin Luther King Jr When you begin to see that your enemy is suffering, that is the beginning of insight. - Thich Nhat Hanh   ~Highly Recommended~ Man's Search for Meaning  - Viktor E. Frankl Maus II: A Survivor's Tale: And Here My Troubles Began (Maus, #2) - Art Spiegelman Maus I: A Survivor's Tale: My Father Bleeds History (Maus, #1) - Art Spiegelman ~Worth a Look~ The Silk Roads: A New History of the World  - Peter Frankopan Early Indians: The Story of Our Ancestors and Where We Came From  - Tony Joseph The Complete Persepolis  - Marjane Satrapi A Memory of Light (The Wheel of Time, #14)  - Robert Jordan Towers of Midnight (Wheel of Time, #13; A Memory of Light, #2) - Robert Jordan The Gathering Storm (Wheel of Time, #12) - Robert Jordan The Path of Daggers (Wheel of Time, #8) - Robert Jordan ~Pleasure Reading~ Reverse Innovation in Health Care  - Vijay Govindar...

जब टीवी हमारी दुनिया की खिड़की था

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सच कहूँ तो इक दौर में दूरदर्शन सिर्फ़ एक चैनल नहीं था, वह हमारी दुनिया की खिड़की था। वही खबरें थीं, वही कहानियाँ थीं, वही हँसी थी और वही इंतज़ार था। वास्तविकता और कल्पना की सीमाएँ साफ़ थीं; जो दिखता था, वह सबका साझा अनुभव बन जाता था। एक ही कार्यक्रम पर चर्चा घर-गली में एक जैसी चल पड़ती थी और बातचीत का रंग भी उससे जुड़ जाता था। विज्ञापन भी यादगार होते थे—छोटी-छोटी चीज़ें सामूहिक यादों में बस जाती थीं।  दूरदर्शन टीवी धारावाहिक नब्बे के दशक के बच्चों के सहनशील होने की बड़ी वजह यही थी कि वे दूरदर्शन पर अपने पसंदीदा धारावाहिक देखने के लिए आने वाली उबाऊ खबरों—हिंदी, अंग्रेज़ी, यहाँ तक कि रविवार विशेष मूक-बधिर समाचार और संस्कृत समाचार—को भी हँसते हुए झेल लेते थे। दोपहर का दूरदर्शन अपने आप में एक पूरी नियमित कार्यक्रम-सारिणी था—जैसे जीवन का सरकारी कैलेंडर। बारह बजे ‘ औरत’ , साढ़े बारह बजे ‘ अपराजिता ’, एक बजे ‘ वक़्त की रफ़्तार ’, डेढ़ बजे ‘ इतिहास ’, दो बजे   अंग्रेज़ी और  हिंदी  समाचार, ढाई बजे ‘ शांति: एक घर की कहानी ’, तीन बजे ‘ युग ’ और साढ़े तीन बजे ‘ स्वाभिमान ’। उन्न...

दूरदर्शन के बच्चों के यादगार शो: DD National और DD Metro के Original व Hindi Dubbed कार्यक्रम

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दूरदर्शन सिर्फ एक टीवी चैनल नहीं था, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के बचपन का भरोसेमंद हिस्सा था। इसी मंच ने बच्चों को विज्ञान, कहानियाँ, कल्पना, स्कूल जीवन, संस्कार, रचनात्मकता और विदेशों से आए पारिवारिक कार्यक्रमों की दुनिया से जोड़ा।  DD National और DD Metro पर ऐसे कई कार्यक्रम आए जो आज भी यादों और nostalgia का अहम हिस्सा हैं। नीचे उन कार्यक्रमों की एक व्यवस्थित सूची दी गई है, जिन्हें दो हिस्सों में बाँटा गया है — Original Shows और Hindi Dubbed Shows 1) Original Shows DD National / DD Aryamaan (आर्यमान) — यह साइंस-फिक्शन/फैंटेसी एक्शन शो भविष्यवादी दुनिया और सुपरहीरो शैली की कहानी पर आधारित था। उस दौर में भारतीय टीवी पर adventurous imagination का यह अलग उदाहरण था।  Aadha Full (आधा फुल) — यह तीन किशोर साथियों की रहस्य सुलझाने वाली टोली और उनकी जीवन-यात्रा की कहानी है। रोमांच, दोस्ती और सामाजिक मुद्दों को मिलाकर यह show बच्चों को सोचने, सवाल पूछने और जिम्मेदार बनने की सीख देता था।  Ank Ajube (अंक अजूबे) — यह बच्चों के लिए गणित पर आधारित रोचक प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम था, जिसका ...

दूरदर्शन के यादगार कार्टून: DD1 और DD2 के बच्चों वाले सुनहरे दिन

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दूरदर्शन के सुनहरे कार्टून दिन: DD1 और DD2 पर बच्चों की यादगार दुनिया दूरदर्शन के दौर में कार्टून सिर्फ मनोरंजन नहीं थे, बल्कि बचपन की रोज़मर्रा की खुशी का हिस्सा थे। DD1 और DD2 पर आने वाले भारतीय मूल के एनिमेटेड शो हों या हिंदी-डब्ड विदेशी कार्टून, हर कार्यक्रम अपने साथ रोमांच, हास्य, दोस्ती और सीख लेकर आता था। आर्काइव्स, फोरम्स और पुरानी यादों से जुड़ी कलेक्शन्स में व्यापक शोध के बाद, यहाँ DD National पर 1980s और 1990s में प्रसारित हुए कार्टूनों और एनिमेटेड कार्यक्रमों की अब तक उपलब्ध सबसे संपूर्ण सूची प्रस्तुत है: 1) DD1 और DD2 से जुड़े भारतीय मूल के कार्टून Bongo — बोंगो अपनी मज़ेदार हरकतों और हल्के-फुल्के रोमांच से बच्चों को हँसी और उत्सुकता दोनों देता था। Ghayab Aya — “ग़ायब आया” रहस्य, शरारत और कल्पना का ऐसा मेल था, जो बच्चों को हर एपिसोड में चौंका देता था। Potli Baba Ki — गुलज़ार का यह शानदार कठपुतली शो नैतिक कहानियों और संवेदनशील प्रस्तुति के लिए खास याद किया जाता है।  ( Title Song Lyrics ) Tales of Panchatantra — पंचतंत्र की पारंपरिक कहानियों पर आधारित यह शो बच्चों क...

सिंगल-स्क्रीन का संस्कार: छोटे शहरों की सामूहिक सिनेमाई स्मृति

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सिनेमाई संस्कार: सिंगल-स्क्रीन थिएटर की स्मृति संस्कार मिलने के लिए दो “माया” होती थीं—एक माँ और दूसरा सिनेमा। माँ जीवन की पहली भाषा सिखाती थी, और सिनेमा दुनिया को देखने का तरीका। माँ से अच्छाई-बुराई की समझ मिलती थी, सिनेमा से भावनाओं की भाषा। माँ घर के भीतर का संसार खोलती थी, सिनेमा घर के बाहर का। छोटे कस्बों में तो सिनेमा कई बार किताब, अखबार, मेला और लोककथा—सबका सम्मिलित रूप लगता था। देवकी पैलेस, काकादेव, कानपुर  उस समय सिंगल-स्क्रीन थिएटर केवल फिल्म दिखाने की जगह नहीं था। वह छोटे शहरों की सामूहिक स्मृति था। वहाँ दर्शक केवल दर्शक नहीं होते थे—वे फिल्म के साथ जीते थे, ताली बजाते थे, सीटियाँ मारते थे, असहज होते थे, हँसते थे, डरते थे, और कई बार फर्स्ट क्लास टिकट के लिए लड़ भी पड़ते थे|  थिएटर एक इमारत भर नहीं था; वह शहर की धड़कन था। अंधेरे हॉल में 300 लोगों की एक धड़कन पुराने सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों का अनुभव अजीब तरह से निजी भी था और सामूहिक भी। अंधेरे हॉल में 300 लोग एक साथ फिल्म देखते थे, लेकिन हर आदमी उसे अपने-अपने तरीके से जीता था। कोई अपने प्रेम की कहानी ढूँढता था, कोई ही...